Couplets Poetry (page 467)

अब की बार जो घर जाना तो सारे एल्बम ले आना

अज़रा नक़वी

आने वाले कल की ख़ातिर हर हर पल क़ुर्बान किया

अज़रा नक़वी

चियूँटियों की तरह हैं चिमटी हुई

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

ज़िंदगी मेरी मुझे क़ैद किए देती है

अज़्म शाकरी

ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा

अज़्म शाकरी

यूँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए

अज़्म शाकरी

ये जो दीवार अँधेरों ने उठा रक्खी है

अज़्म शाकरी

शब की आग़ोश में महताब उतारा उस ने

अज़्म शाकरी

सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है

अज़्म शाकरी

मेरे जिस्म से वक़्त ने कपड़े नोच लिए

अज़्म शाकरी

मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया

अज़्म शाकरी

अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ

अज़्म शाकरी

अगर साए से जल जाने का इतना ख़ौफ़ था तो फिर

अज़्म शाकरी

आँसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्ताँ

अज़्म शाकरी

आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं

अज़्म शाकरी

उठो 'अज़्म' इस आतिश-ए-शौक़ को सर्द होने से रोको

अज़्म बहज़ाद

सवाल करने के हौसले से जवाब देने के फ़ैसले तक

अज़्म बहज़ाद

रौशनी ढूँड के लाना कोई मुश्किल तो न था

अज़्म बहज़ाद

कोई आसान रिफ़ाक़त नहीं लिक्खी मैं ने

अज़्म बहज़ाद

कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में

अज़्म बहज़ाद

कल सामने मंज़िल थी पीछे मिरी आवाज़ें

अज़्म बहज़ाद

दरिया पार उतरने वाले ये भी जान नहीं पाए

अज़्म बहज़ाद

अजब महफ़िल है सब इक दूसरे पर हँस रहे हैं

अज़्म बहज़ाद

ऐ ख़्वाब-ए-पज़ीराई तू क्यूँ मिरी आँखों में

अज़्म बहज़ाद

आमादगी को वस्ल से मशरूत मत समझ

अज़्म बहज़ाद

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

अज़लान शाह

तुम मोहब्बत का उसे नाम भी दे लो लेकिन

अज़लान शाह

तू बात नहीं सुनता यही हल है फिर इस का

अज़लान शाह

तू आ गया है तो अब याद भी नहीं मुझ को

अज़लान शाह

तवील उम्र की ढेरों दुआएँ भेजी हैं

अज़लान शाह