Couplets Poetry (page 466)
बुराई या भलाई गो है अपने वास्ते लेकिन
ज़फ़र
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
ज़फ़र
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ज़फ़र
बनाया ऐ 'ज़फ़र' ख़ालिक़ ने कब इंसान से बेहतर
ज़फ़र
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
ज़फ़र
औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल
ज़फ़र
ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से
ज़फ़र
मैं ही ग़मगीन नहीं तर्क-ए-तअल्लुक़ पे 'कमाल'
बाग़ हुसैन कमाल
मैं भी गुम-सुम था कोई बात न करने पाया
बाग़ हुसैन कमाल
क़ातिल की सारी साज़िशें नाकाम ही रहीं
बद्र वास्ती
फलदार दरख़्तों ने रिझाया तो मुझे भी
बद्र वास्ती
लहू का आख़िरी क़तरा निचोड़ने पर भी
बद्र वास्ती
हर शख़्स को गुमान कि मंज़िल नहीं है दूर
बद्र वास्ती
अज़ाब होती हैं अक्सर शबाब की घड़ियाँ
बद्र वास्ती
आज-कल तो सब के सब टीवी के दीवाने हुए
बद्र वास्ती
थकन से चूर है सारा वजूद अब मेरा
बाबर रहमान शाह
मुफ़्लिसी ने जा-ब-जा लूटा हमें
बाबर रहमान शाह
किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा
बाबर रहमान शाह
दिल से आख़िर चराग़-ए-वस्ल बुझा
बाबर रहमान शाह
दिल ने हम से अजब ही काम लिया
बाबर रहमान शाह
ऐ परी-ज़ाद तेरे जाने पर
बाबर रहमान शाह
आतिश-ए-इश्क़ जब जलाती है
बाबर रहमान शाह
किस ने कहा है दीवारों पर साया करता है सूरज
अज़रक़ अदीम
ज़मीं के और तक़ाज़े फ़लक कुछ और कहे
अज़रा परवीन
उस ने मेरे नाम सूरज चाँद तारे लिख दिया
अज़रा परवीन
सिमट गई तो शबनम फूल सितारा थी
अज़रा परवीन
रंग अपने जो थे भर भी कहाँ पाए कभी हम
अज़रा परवीन
चार सम्तें आईना सी हर तरफ़
अज़रा परवीन
फैलते हुए शहरो अपनी वहशतें रोको
अज़रा नक़वी
हक़ीक़तें तो मिरे रोज़ ओ शब की साथी हैं
अज़रा नक़वी