Couplets Poetry (page 465)
मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी
ज़फ़र
मेहनत से है अज़्मत कि ज़माने में नगीं को
ज़फ़र
मर्ग ही सेहत है उस की मर्ग ही उस का इलाज
ज़फ़र
मैं सिसकता रह गया और मर गए फ़रहाद ओ क़ैस
ज़फ़र
लोगों का एहसान है मुझ पर और तिरा मैं शुक्र-गुज़ार
ज़फ़र
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
ज़फ़र
लड़ा कर आँख उस से हम ने दुश्मन कर लिया अपना
ज़फ़र
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
ज़फ़र
क्या पूछता है हम से तू ऐ शोख़ सितमगर
ज़फ़र
कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल
ज़फ़र
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
ज़फ़र
ख़्वाब मेरा है ऐन बेदारी
ज़फ़र
ख़ुदा के वास्ते ज़ाहिद उठा पर्दा न काबे का
ज़फ़र
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
ज़फ़र
जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
ज़फ़र
इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
ज़फ़र
इधर ख़याल मिरे दिल में ज़ुल्फ़ का गुज़रा
ज़फ़र
हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे
ज़फ़र
हम अपना इश्क़ चमकाएँ तुम अपना हुस्न चमकाओ
ज़फ़र
हो गया जिस दिन से अपने दिल पर उस को इख़्तियार
ज़फ़र
हाथ क्यूँ बाँधे मिरे छल्ला अगर चोरी हुआ
ज़फ़र
हमदमो दिल के लगाने में कहो लगता है क्या
ज़फ़र
हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह
ज़फ़र
ग़ज़ब है कि दिल में तो रक्खो कुदूरत
ज़फ़र
फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त
ज़फ़र
दिल को दिल से राह है तो जिस तरह से हम तुझे
ज़फ़र
देख दिल को मिरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़
ज़फ़र
दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ
ज़फ़र
चाहिए उस का तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना
ज़फ़र
बुत-परस्ती जिस से होवे हक़-परस्ती ऐ 'ज़फ़र'
ज़फ़र