Couplets Poetry (page 464)

ज़ाहिरी वाज़ से है क्या हासिल

बहराम जी

ज़ाहिदा काबे को जाता है तो कर याद-ए-ख़ुदा

बहराम जी

यार को हम ने बरमला देखा

बहराम जी

रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-जाँ में बुतों का पड़ गया

बहराम जी

पता मिलता नहीं उस बे-निशाँ का

बहराम जी

नहीं दुनिया में आज़ादी किसी को

बहराम जी

नहीं बुत-ख़ाना ओ काबा पे मौक़ूफ़

बहराम जी

मैं बरहमन ओ शैख़ की तकरार से समझा

बहराम जी

कहता है यार जुर्म की पाते हो तुम सज़ा

बहराम जी

कहीं ख़ालिक़ हुआ कहीं मख़्लूक़

बहराम जी

जा-ब-जा हम को रही जल्वा-ए-जानाँ की तलाश

बहराम जी

इश्क़ में दिल से हम हुए महव तुम्हारे ऐ बुतो

बहराम जी

है मुसलमाँ को हमेशा आब-ए-ज़मज़म की तलाश

बहराम जी

ढूँढ कर दिल में निकाला तुझ को यार

बहराम जी

'ज़फ़र' बदल के रदीफ़ और तू ग़ज़ल वो सुना

ज़फ़र

'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का

ज़फ़र

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

ये चमन यूँही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें

ज़फ़र

यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी मैं न था

ज़फ़र

याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में

ज़फ़र

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें

ज़फ़र

तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा

ज़फ़र

तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने

ज़फ़र

सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह

ज़फ़र

सब मिटा दें दिल से हैं जितनी कि उस में ख़्वाहिशें

ज़फ़र

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'

ज़फ़र

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर

ज़फ़र

न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल

ज़फ़र

न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना

ज़फ़र

न दूँगा दिल उसे मैं ये हमेशा कहता था

ज़फ़र