Couplets Poetry (page 462)

ऐसी बेगानगी नहीं देखी

बाक़र मेहदी

आज़मा लो कि दिल को चैन आए

बाक़र मेहदी

आईना क्या किस को दिखाता गली गली हैरत बिकती थी

बाक़र मेहदी

सर-ए-सौदा पे तिरे शेर-ए-रसा से 'आगाह'

बाक़र आगाह वेलोरी

मैं तेरे हिज्र में जीने से हो गया था उदास

बाक़र आगाह वेलोरी

क्या ख़ूब मेरे बख़्त की मंडवे चढ़ी है बेल

बाक़र आगाह वेलोरी

क्या फ़ाएदा है क़िस्सा-ए-रिज़वान से तुझे

बाक़र आगाह वेलोरी

देखते देखते सितम तेरा

बाक़र आगाह वेलोरी

ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही

बक़ा बलूच

तू ख़ुश है अपनी दुनिया में

बक़ा बलूच

सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं

बक़ा बलूच

मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं

बक़ा बलूच

लोग चले हैं सहराओं को

बक़ा बलूच

कैसा लम्हा आन पड़ा है

बक़ा बलूच

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी

बक़ा बलूच

हम ने जिन को सच्चा जाना

बक़ा बलूच

हर कूचे में अरमानों का ख़ून हुआ

बक़ा बलूच

गर्मी-ए-शिद्दत-ए-जज़्बात बता देता है

बक़ा बलूच

एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम

बक़ा बलूच

दर्द उट्ठा था मिरे पहलू में

बक़ा बलूच

तू भले मेरा ए'तिबार न कर

बलवान सिंह आज़र

पूछना चाँद का पता 'आज़र'

बलवान सिंह आज़र

पावँ से काँटा निकल जाए अगर

बलवान सिंह आज़र

मार देती है ज़िंदगी ठोकर

बलवान सिंह आज़र

कोई मंज़िल कभी नहीं आई

बलवान सिंह आज़र

खुला मकान है हर एक ज़िंदगी 'आज़र'

बलवान सिंह आज़र

ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र

बलवान सिंह आज़र

हवा के दोश पर लगता है उड़ने

बलवान सिंह आज़र

हार जाएगी यक़ीनन तीरगी

बलवान सिंह आज़र

चलूँगा कब तलक तन्हा सफ़र में

बलवान सिंह आज़र