Couplets Poetry (page 461)

इश्क़ में बू है किबरियाई की

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

इस बज़्म में पूछे न कोई मुझ से कि क्या हूँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दिला उठाइए हर तरह उस की चश्म का नाज़

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

देखा तो एक शो'ले से ऐ शैख़-ओ-बरहमन

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

देख आईना जो कहता है कि अल्लाह-रे मैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

छोड़ कर कूचा-ए-मय-ख़ाना तरफ़ मस्जिद के

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

बुलबुल से कहा गुल ने कर तर्क मुलाक़ातें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

बस पा-ए-जुनूँ सैर-ए-बयाबाँ तो बहुत की

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

बाँग-ए-तकबीर तो ऐसी है 'बक़ा' सीना-ख़राश

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

अपनी मर्ज़ी तो ये है बंदा-ए-बुत हो रहिए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ऐ इश्क़ तू हर-चंद मिरा दुश्मन-ए-जाँ हो

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ये सोच कर तिरी महफ़िल से हम चले आए

बाक़र मेहदी

ये किस जगह पे क़दम रुक गए हैं क्या कहिए

बाक़र मेहदी

सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो

बाक़र मेहदी

क़ाफ़िले ख़ुद सँभल सँभल के बढ़े

बाक़र मेहदी

मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है

बाक़र मेहदी

मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं

बाक़र मेहदी

काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए

बाक़र मेहदी

कभी तो भूल गए पी के नाम तक उन का

बाक़र मेहदी

जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं

बाक़र मेहदी

जाने किन मुश्किलों से जीते हैं

बाक़र मेहदी

इस तरह कुछ बदल गई है ज़मीं

बाक़र मेहदी

इस शहर में है कौन हमारा तिरे सिवा

बाक़र मेहदी

हम मिलें या न मिलें फिर भी कभी ख़्वाबों में

बाक़र मेहदी

फ़ासले ऐसे कि इक उम्र में तय हो न सकें

बाक़र मेहदी

एक तूफ़ाँ की तरह कब से किनारा-कश है

बाक़र मेहदी

दामन-ए-सब्र के हर तार से उठता है धुआँ

बाक़र मेहदी

चले तो जाते हो रूठे हुए मगर सुन लो

बाक़र मेहदी