Couplets Poetry (page 459)

दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

छुप सका दम भर न राज़-ए-दिल फ़िराक़-ए-यार में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

बे-बुलाए हुए जाना मुझे मंज़ूर नहीं

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

बाद-ए-फ़ना भी है मरज़-ए-इश्क़ का असर

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

अज़ाँ दी काबे में नाक़ूस दैर में फूँका

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

अज़ाँ दी काबा में नाक़ूस दैर में फूँका

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

असर ज़ुल्फ़ का बरमला हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

अगर हयात है देखेंगे एक दिन दीदार

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

शब-ए-फ़ुर्क़त नज़र आते नहीं आसार-ए-सहर

बर्क़ देहलवी

रहेगा किस का हिस्सा बेशतर मेरे मिटाने में

बर्क़ देहलवी

दिन-रात पड़ा रहता हूँ दरवाज़े पे अपने

बर्क़ देहलवी

ज़िंदगी की बिसात पर 'बाक़ी'

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ भी होने का पता देते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

यही रस्ता है अब यही मंज़िल

बाक़ी सिद्दीक़ी

वक़्त के पास हैं कुछ तस्वीरें

बाक़ी सिद्दीक़ी

वक़्त का पत्थर भारी होता जाता है

बाक़ी सिद्दीक़ी

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुम ज़माने की राह से आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुम भी उल्टी उल्टी बातें पूछते हो

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुझ को देखा तिरे वादे देखे

बाक़ी सिद्दीक़ी

तेरी हर बात पे चुप रहते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

तेरे ग़म से तो सुकून मिलता है

बाक़ी सिद्दीक़ी

रहने दो कि अब तुम भी मुझे पढ़ न सकोगे

बाक़ी सिद्दीक़ी

राज़-ए-सर-बस्ता है महफ़िल तेरी

बाक़ी सिद्दीक़ी

पहले हर बात पे हम सोचते थे

बाक़ी सिद्दीक़ी

कुछ न पा कर भी मुतमइन हैं हम

बाक़ी सिद्दीक़ी

ख़ुद-फ़रेबी सी ख़ुद-फ़रेबी है

बाक़ी सिद्दीक़ी

कश्तियाँ टूट गई हैं सारी

बाक़ी सिद्दीक़ी

कान पड़ती नहीं आवाज़ कोई

बाक़ी सिद्दीक़ी