Couplets Poetry (page 457)
हँसो आज इतना कि इस शोर में
बशीर बद्र
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
बशीर बद्र
गुफ़्तुगू उन से रोज़ होती है
बशीर बद्र
ग़ज़लों ने वहीं ज़ुल्फ़ों के फैला दिए साए
बशीर बद्र
ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे
बशीर बद्र
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बशीर बद्र
घर नया बर्तन नए कपड़े नए
बशीर बद्र
गले में उस के ख़ुदा की अजीब बरकत है
बशीर बद्र
इक शाम के साए तले बैठे रहे वो देर तक
बशीर बद्र
एक औरत से वफ़ा करने का ये तोहफ़ा मिला
बशीर बद्र
दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो क़दम
बशीर बद्र
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
बशीर बद्र
दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे
बशीर बद्र
दिन में परियों की कोई कहानी न सुन
बशीर बद्र
दिल उजड़ी हुई एक सराए की तरह है
बशीर बद्र
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
बशीर बद्र
दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे
बशीर बद्र
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बशीर बद्र
चाँद सा मिस्रा अकेला है मिरे काग़ज़ पर
बशीर बद्र
बिछी थीं हर तरफ़ आँखें ही आँखें
बशीर बद्र
भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
बशीर बद्र
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
बशीर बद्र
बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
बशीर बद्र
बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम
बशीर बद्र
बहुत दिनों से है दिल अपना ख़ाली ख़ाली सा
बशीर बद्र
बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी
बशीर बद्र
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
बशीर बद्र
अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
बशीर बद्र
अजीब रात थी कल तुम भी आ के लौट गए
बशीर बद्र
अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ
बशीर बद्र