Couplets Poetry (page 456)
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने
बशीर बद्र
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
बशीर बद्र
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
बशीर बद्र
कमरे वीराँ आँगन ख़ाली फिर ये कैसी आवाज़ें
बशीर बद्र
कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से
बशीर बद्र
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
बशीर बद्र
काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
बशीर बद्र
कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
बशीर बद्र
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
बशीर बद्र
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
बशीर बद्र
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
बशीर बद्र
कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँही आँखें
बशीर बद्र
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
बशीर बद्र
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
बशीर बद्र
जी बहुत चाहता है सच बोलें
बशीर बद्र
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
बशीर बद्र
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
बशीर बद्र
इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
बशीर बद्र
इस शहर के बादल तिरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं
बशीर बद्र
इजाज़त हो तो मैं इक झूट बोलूँ
बशीर बद्र
हम ने तो बाज़ार में दुनिया बेची और ख़रीदी है
बशीर बद्र
हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं
बशीर बद्र
हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घूमे
बशीर बद्र
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
बशीर बद्र
हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में
बशीर बद्र
हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में
बशीर बद्र
हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
बशीर बद्र
हसीं तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ सा
बशीर बद्र
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
बशीर बद्र
हक़ीक़तों में ज़माना बहुत गुज़ार चुके
बशीर बद्र