Couplets Poetry (page 458)
अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गए हैं
बशीर बद्र
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
बशीर बद्र
अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना
बशीर बद्र
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
बशीर बद्र
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
बशीर बद्र
आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बशीर बद्र
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
बशीर बद्र
शाम ढलते ही ये आलम है तो क्या जाने बशीर
बशीर अहमद बशीर
ये एहतिमाम-ए-चराग़ाँ बजा सही लेकिन
बशर नवाज़
वही है रंग मगर बू है कुछ लहू जैसी
बशर नवाज़
तुझ में और मुझ में तअल्लुक़ है वही
बशर नवाज़
तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं
बशर नवाज़
प्यार के बंधन ख़ून के रिश्ते टूट गए ख़्वाबों की तरह
बशर नवाज़
कोई यादों से जोड़ ले हम को
बशर नवाज़
कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़
बशर नवाज़
जाने किन रिश्तों ने मुझ को बाँध रक्खा है कि मैं
बशर नवाज़
घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं
बशर नवाज़
बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
बशर नवाज़
उर्यां हरारत-ए-तप-ए-फ़ुर्क़त से मैं रहा
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
नहीं बुतों के तसव्वुर से कोई दिल ख़ाली
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
न सिकंदर है न दारा है न क़ैसर है न जम
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ख़ुद-फ़रोशी को जो तू निकले ब-शक्ल-ए-यूसुफ़
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
जोश-ए-वहशत यही कहता है निहायत कम है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
इतना तो जज़्ब-ए-इश्क़ ने बारे असर किया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
हम तो अपनों से भी बेगाना हुए उल्फ़त में
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
गया शबाब न पैग़ाम-ए-वस्ल-ए-यार आया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
देख कर तूल-ए-शब-ए-हिज्र दुआ करता हूँ
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़