Couplets Poetry (page 460)
इस बदलते हुए ज़माने में
बाक़ी सिद्दीक़ी
हम कि शोला भी हैं और शबनम भी
बाक़ी सिद्दीक़ी
हो गए चुप हमें पागल कह कर
बाक़ी सिद्दीक़ी
हर याद हर ख़याल है लफ़्ज़ों का सिलसिला
बाक़ी सिद्दीक़ी
हर नए हादसे पे हैरानी
बाक़ी सिद्दीक़ी
हाए वो बातें जो कह सकते नहीं
बाक़ी सिद्दीक़ी
एक पल में वहाँ से हम उट्ठे
बाक़ी सिद्दीक़ी
एक दीवार उठाने के लिए
बाक़ी सिद्दीक़ी
दुनिया ने हर बात में क्या क्या रंग भरे
बाक़ी सिद्दीक़ी
दोस्ती ख़ून-ए-जिगर चाहती है
बाक़ी सिद्दीक़ी
दोस्त हर ऐब छुपा लेते हैं
बाक़ी सिद्दीक़ी
दिल में जब बात नहीं रह सकती
बाक़ी सिद्दीक़ी
दिल की दीवार गिर गई शायद
बाक़ी सिद्दीक़ी
'बाक़ी' जो चुप रहोगे तो उट्ठेंगी उँगलियाँ
बाक़ी सिद्दीक़ी
बंद कलियों की अदा कहती है
बाक़ी सिद्दीक़ी
सारी बस्ती में फ़क़त मेरा ही घर है बे-चराग़
बाक़ी अहमदपुरी
सब दोस्त मस्लहत के दुकानों में बिक गए
बाक़ी अहमदपुरी
दोस्त नाराज़ हो गए कितने
बाक़ी अहमदपुरी
ये रिंद दे गए लुक़्मा तुझे तो उज़्र न मान
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
उल्फ़त में तिरी ऐ बुत-ए-बे-मेहर-ओ-मोहब्बत
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
सैलाब से आँखों के रहते हैं ख़राबे में
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
रुश्द-ए-बातिन की तलब है तो कर ऐ शैख़ वो काम
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
क़लम सिफ़त में पस-अज़-मरातिब बदन सना में तिरी खपाया
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
क्या तुझ को लिखूँ ख़त हरकत हाथ से गुम है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ख़्वाहिश-ए-सूद थी सौदे में मोहब्बत के वले
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ख़ाल-ए-लब आफ़त-ए-जाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
काबा तो संग-ओ-ख़िश्त से ऐ शैख़ मिल बना
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'