Couplets Poetry (page 469)
थपकियाँ देते रहे ठंडी हवा के झोंके
अज़ीज़ तमन्नाई
हज़ार बार आज़मा चुका है मगर अभी आज़मा रहा है
अज़ीज़ तमन्नाई
हमीं ने ज़ीस्त के हर रूप को सँवारा है
अज़ीज़ तमन्नाई
एक सन्नाटा था आवाज़ न थी और न जवाब
अज़ीज़ तमन्नाई
अब कौन सी मता-ए-सफ़र दिल के पास है
अज़ीज़ तमन्नाई
वो एक राज़! जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं
अज़ीज़ नबील
तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है
अज़ीज़ नबील
सारे सपने बाँध रखे हैं गठरी में
अज़ीज़ नबील
फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग
अज़ीज़ नबील
'नबील' इस इश्क़ में तुम जीत भी जाओ तो क्या होगा
अज़ीज़ नबील
'नबील' ऐसा करो तुम भी भूल जाओ उसे
अज़ीज़ नबील
न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है
अज़ीज़ नबील
मुसाफ़िरों से कहो अपनी प्यास बाँध रखें
अज़ीज़ नबील
मैं किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ 'नबील'
अज़ीज़ नबील
मैं छुप रहा हूँ कि जाने किस दम
अज़ीज़ नबील
किसी से ज़ेहन जो मिलता तो गुफ़्तुगू करते
अज़ीज़ नबील
हम क़ाफ़िले से बिछड़े हुए हैं मगर 'नबील'
अज़ीज़ नबील
गुज़र रहा हूँ किसी ख़्वाब के इलाक़े से
अज़ीज़ नबील
चुपके चुपके वो पढ़ रहा है मुझे
अज़ीज़ नबील
चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन
अज़ीज़ नबील
ज़बान दिल की हक़ीक़त को क्या बयाँ करती
अज़ीज़ लखनवी
ये तेरी आरज़ू में बढ़ी वुसअत-ए-नज़र
अज़ीज़ लखनवी
ये मशवरा बहम उठ्ठे हैं चारा-जू करते
अज़ीज़ लखनवी
वही हिकायत-ए-दिल थी वही शिकायत-ए-दिल
अज़ीज़ लखनवी
उदासी अब किसी का रंग जमने ही नहीं देती
अज़ीज़ लखनवी
तुम ने छेड़ा तो कुछ खुले हम भी
अज़ीज़ लखनवी
तुम्हें हँसते हुए देखा है जब से
अज़ीज़ लखनवी
तिरी कोशिश हम ऐ दिल सई-ए-ला-हासिल समझते हैं
अज़ीज़ लखनवी
तक़लीद अब मैं हज़रत-ए-वाइज़ की क्यूँ करूँ
अज़ीज़ लखनवी
तमाम अंजुमन-ए-वाज़ हो गई बरहम
अज़ीज़ लखनवी