Couplets Poetry (page 557)

जिस तरफ़ उठ गई हैं आहें हैं

अकबर इलाहाबादी

जवानी की है आमद शर्म से झुक सकती हैं आँखें

अकबर इलाहाबादी

जवानी की दुआ लड़कों को ना-हक़ लोग देते हैं

अकबर इलाहाबादी

जल्वा न हो मअ'नी का तो सूरत का असर क्या

अकबर इलाहाबादी

जब मैं कहता हूँ कि या अल्लाह मेरा हाल देख

अकबर इलाहाबादी

जब ग़म हुआ चढ़ा लीं दो बोतलें इकट्ठी

अकबर इलाहाबादी

जान शायद फ़रिश्ते छोड़ भी दें

अकबर इलाहाबादी

इश्वा भी है शोख़ी भी तबस्सुम भी हया भी

अकबर इलाहाबादी

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अकबर इलाहाबादी

इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है

अकबर इलाहाबादी

इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम

अकबर इलाहाबादी

इस गुलिस्ताँ में बहुत कलियाँ मुझे तड़पा गईं

अकबर इलाहाबादी

इलाही कैसी कैसी सूरतें तू ने बनाई हैं

अकबर इलाहाबादी

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए

अकबर इलाहाबादी

हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिल-ए-ज़ब्ती समझते हैं

अकबर इलाहाबादी

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

अकबर इलाहाबादी

हुए इस क़दर मोहज़्ज़ब कभी घर का मुँह न देखा

अकबर इलाहाबादी

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

अकबर इलाहाबादी

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से

अकबर इलाहाबादी

हर चंद बगूला मुज़्तर है इक जोश तो उस के अंदर है

अकबर इलाहाबादी

हक़ीक़ी और मजाज़ी शायरी में फ़र्क़ ये पाया

अकबर इलाहाबादी

ग़ज़ब है वो ज़िद्दी बड़े हो गए

अकबर इलाहाबादी

ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

ग़म-ख़ाना-ए-जहाँ में वक़अत ही क्या हमारी

अकबर इलाहाबादी

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

एक काफ़िर पर तबीअत आ गई

अकबर इलाहाबादी

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

अकबर इलाहाबादी

दुख़्तर-ए-रज़ ने उठा रक्खी है आफ़त सर पर

अकबर इलाहाबादी

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली

अकबर इलाहाबादी

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त

अकबर इलाहाबादी