Couplets Poetry (page 559)

लोग जीते हैं किस तरह 'अजमल'

अजमल सिराज

कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

कौन आता है इस ख़राबे में

अजमल सिराज

ग़म सभी दिल से रुख़्सत हुए

अजमल सिराज

दिखा दूँगा तमाशा दी अगर फ़ुर्सत ज़माने ने

अजमल सिराज

बताओ तुम से कहाँ राब्ता किया जाए

अजमल सिराज

बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा

अजमल सिराज

बदल जाएँगे ये दिन रात 'अजमल'

अजमल सिराज

'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं

अजमल सिराज

अब आप ख़ुद ही बताएँ ये ज़िंदगी क्या है

अजमल सिराज

ये ही हैं दिन, बाग़ी अगर बनना है बन

अजमल सिद्दीक़ी

मेरे साथ सु-ए-जुनून चल मिरे ज़ख़्म खा मिरा रक़्स कर

अजमल सिद्दीक़ी

क्या क्या न पढ़ा इस मकतब में, कितने ही हुनर सीखे हैं यहाँ

अजमल सिद्दीक़ी

कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का

अजमल सिद्दीक़ी

जिस दिन से गया वो जान-ए-ग़ज़ल हर मिसरे की सूरत बिगड़ी

अजमल सिद्दीक़ी

हर एक सुब्ह वज़ू करती हैं मिरी आँखें

अजमल सिद्दीक़ी

दिल तो सादा है तेरी हर बात को सच्चा मानता है

अजमल सिद्दीक़ी

बोल पड़ता तो मिरी बात मिरी ही रहती

अजमल सिद्दीक़ी

बाज़ार में इक चीज़ नहिं काम की मेरे

अजमल सिद्दीक़ी

अलग अलग तासीरें इन की, अश्कों के जो धारे हैं

अजमल सिद्दीक़ी

आस पे तेरी बिखरा देता हूँ कमरे की सब चीज़ें

अजमल सिद्दीक़ी

तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है

अजमल अजमली

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो

अजमल अजमली

कितनी तवील क्यूँ न हो बातिल की ज़िंदगी

अजमल अजमली

जब भी मिलता हूँ वही चेहरा लिए

अजमल अजमली

हज़ार मंज़िल-ए-ग़म से गुज़र चुके लेकिन

अजमल अजमली

'अजमल' न आप सा भी कोई सख़्त-जाँ मिला

अजमल अजमली

आरज़ू थी खींचते हम भी कोई अक्स-ए-हयात

अजमल अजमली

सितम ये है वो कभी भूल कर नहीं आया

आजिज़ मातवी