Couplets Poetry (page 560)

मुंतज़िर हूँ मैं कफ़न बाँध के सर से 'आजिज़'

आजिज़ मातवी

मैं जिन को अपना कहता हूँ कब वो मिरे काम आते हैं

आजिज़ मातवी

महव-ए-हैरत हूँ ख़राश-ए-दस्त-ए-ग़म को देख कर

आजिज़ मातवी

इंसान हादसात से कितना क़रीब है

आजिज़ मातवी

होता है महसूस ये 'आजिज़' शायद उस ने दस्तक दी

आजिज़ मातवी

हो बिजलियों का मुझ से जहाँ पर मुक़ाबला

आजिज़ मातवी

हसरतें आ आ के जम्अ हो रही हैं दिल के पास

आजिज़ मातवी

एक हम हैं हम ने कश्ती डाल दी गिर्दाब में

आजिज़ मातवी

आग़ाज़-ए-मोहब्बत में 'आजिज़' रुकती न थी मौज-ए-अश्क-ए-रवाँ

आजिज़ मातवी

हर ख़ुदा जन्नतों में है महदूद

अजय सहाब

फ़न जो मेआ'र तक नहीं पहुँचा

अजय सहाब

ऐसे सुलग उठा तिरी यादों से दिल मिरा

अजय सहाब

ये जो फूलों से भरा शहर हुआ करता था

ऐतबार साजिद

ये बरसों का तअल्लुक़ तोड़ देना चाहते हैं हम

ऐतबार साजिद

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो

ऐतबार साजिद

तअल्लुक़ात में गहराइयाँ तो अच्छी हैं

ऐतबार साजिद

तअल्लुक़ किर्चियों की शक्ल में बिखरा तो है फिर भी

ऐतबार साजिद

रिहा कर दे क़फ़स की क़ैद से घायल परिंदे को

ऐतबार साजिद

रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया

ऐतबार साजिद

फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे

ऐतबार साजिद

फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है

ऐतबार साजिद

पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे

ऐतबार साजिद

मुख़्तलिफ़ अपनी कहानी है ज़माने भर से

ऐतबार साजिद

मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द

ऐतबार साजिद

मेरी पोशाक तो पहचान नहीं है मेरी

ऐतबार साजिद

मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती

ऐतबार साजिद

मैं तकिए पर सितारे बो रहा हूँ

ऐतबार साजिद

किसी को साल-ए-नौ की क्या मुबारकबाद दी जाए

ऐतबार साजिद

किसे पाने की ख़्वाहिश है कि 'साजिद'

ऐतबार साजिद

जुदाइयों की ख़लिश उस ने भी न ज़ाहिर की

ऐतबार साजिद