Couplets Poetry (page 561)

जो मिरी शबों के चराग़ थे जो मिरी उमीद के बाग़ थे

ऐतबार साजिद

जिस को हम ने चाहा था वो कहीं नहीं इस मंज़र में

ऐतबार साजिद

इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा

ऐतबार साजिद

हम तिरे ख़्वाबों की जन्नत से निकल कर आ गए

ऐतबार साजिद

गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर

ऐतबार साजिद

ग़ज़ल फ़ज़ा भी ढूँडती है अपने ख़ास रंग की

ऐतबार साजिद

दिए मुंडेर प रख आते हैं हम हर शाम न जाने क्यूँ

ऐतबार साजिद

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए

ऐतबार साजिद

छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ

ऐतबार साजिद

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें

ऐतबार साजिद

बरसों ब'अद हमें देखा तो पहरों उस ने बात न की

ऐतबार साजिद

अजब नशा है तिरे क़ुर्ब में कि जी चाहे

ऐतबार साजिद

अब तो ख़ुद अपनी ज़रूरत भी नहीं है हम को

ऐतबार साजिद

सीने में इक खटक सी है और बस

ऐश देहलवी

कलाम-ए-मीर समझे और ज़बान-ए-मीरज़ा समझे

ऐश देहलवी

बे-सबाती चमन-ए-दहर की है जिन पे खुली

ऐश देहलवी

ऐ शम्अ सुब्ह होती है रोती है किस लिए

ऐश देहलवी

अंजान अगर हो तो गुज़र क्यूँ नहीं जाते

ऐश बर्नी

तू जो इस दुनिया की ख़ातिर अपना-आप गँवाता है

ऐन ताबिश

रोज़ इक मर्ग का आलम भी गुज़रता है यहाँ

ऐन ताबिश

मैं उस घड़ी अपने आप का सामना भी करने से भागता हूँ

ऐन ताबिश

मैं अपना कार-ए-वफ़ा आज़माऊँगा फिर भी

ऐन ताबिश

जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ऐन ताबिश

इसी क़दर है हयात ओ अजल के बीच का फ़र्क़

ऐन ताबिश

हर ऐसे-वैसे से क़ुफ़्ल-ए-क़फ़स नहीं खुलता

ऐन ताबिश

है एक ही लम्हा जो कहीं वस्ल कहीं हिज्र

ऐन ताबिश

इक ज़रा चैन भी लेते नहीं 'ताबिश'-साहब

ऐन ताबिश

एक ख़ुश्बू थी जो मल्बूस पे ताबिंदा थी

ऐन ताबिश

एक बस्ती थी हुई वक़्त के अंदोह में गुम

ऐन ताबिश

बे-हुनर देख न सकते थे मगर देखने आए

ऐन ताबिश