Couplets Poetry (page 555)

किसी को अपने सिवा कुछ नज़र नहीं आता

अकबर हमीदी

हवा सहला रही है उस के तन को

अकबर हमीदी

फ़नकार ब-ज़िद है कि लगाएगा नुमाइश

अकबर हमीदी

ज़रूरी चीज़ है इक तजरबा भी ज़िंदगानी में

अकबर इलाहाबादी

ये है कि झुकाता है मुख़ालिफ़ की भी गर्दन

अकबर इलाहाबादी

ये दिलबरी ये नाज़ ये अंदाज़ ये जमाल

अकबर इलाहाबादी

यहाँ की औरतों को इल्म की परवा नहीं बे-शक

अकबर इलाहाबादी

वस्ल हो या फ़िराक़ हो 'अकबर'

अकबर इलाहाबादी

उन्हें भी जोश-ए-उल्फ़त हो तो लुत्फ़ उट्ठे मोहब्बत का

अकबर इलाहाबादी

तुम्हारे वाज़ में तासीर तो है हज़रत-ए-वाइज़

अकबर इलाहाबादी

तुम नाक चढ़ाते हो मिरी बात पे ऐ शैख़

अकबर इलाहाबादी

तिफ़्ल में बू आए क्या माँ बाप के अतवार की

अकबर इलाहाबादी

तय्यार थे नमाज़ पे हम सुन के ज़िक्र-ए-हूर

अकबर इलाहाबादी

तश्बीह तिरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से

अकबर इलाहाबादी

तअल्लुक़ आशिक़ ओ माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था

अकबर इलाहाबादी

तहसीन के लायक़ तिरा हर शेर है 'अकबर'

अकबर इलाहाबादी

सीने से लगाएँ तुम्हें अरमान यही है

अकबर इलाहाबादी

सिधारें शैख़ काबा को हम इंग्लिस्तान देखेंगे

अकबर इलाहाबादी

शैख़ की दावत में मय का काम क्या

अकबर इलाहाबादी

शैख़ अपनी रग को क्या करें रेशे को क्या करें

अकबर इलाहाबादी

सौ जान से हो जाऊँगा राज़ी मैं सज़ा पर

अकबर इलाहाबादी

समझ में साफ़ आ जाए फ़साहत इस को कहते हैं

अकबर इलाहाबादी

सब हो चुके हैं उस बुत-ए-काफ़िर-अदा के साथ

अकबर इलाहाबादी

रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा जा के थाने में

अकबर इलाहाबादी

रहता है इबादत में हमें मौत का खटका

अकबर इलाहाबादी

रह-ओ-रस्म-ए-मोहब्बत इन हसीनों से मैं क्या रक्खूँ

अकबर इलाहाबादी

रहमान के फ़रिश्ते गो हैं बहुत मुक़द्दस

अकबर इलाहाबादी

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ

अकबर इलाहाबादी

पूछा 'अकबर' है आदमी कैसा

अकबर इलाहाबादी

पब्लिक में ज़रा हाथ मिला लीजिए मुझ से

अकबर इलाहाबादी