Couplets Poetry (page 554)
उजाला है जो ये कौन-ओ-मकाँ में
अकबर मासूम
तिरे ग़ुरूर की इस्मत-दरी पे नादिम हूँ
अकबर मासूम
रह जाएगी ये सारी कहानी यहीं धरी
अकबर मासूम
मैं किसी और ही आलम का मकीं हूँ प्यारे
अकबर मासूम
जिस के बग़ैर जी नहीं सकते थे जा चुका
अकबर मासूम
है मुसीबत में गिरफ़्तार मुसीबत मेरी
अकबर मासूम
ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो
अकबर मासूम
अब तुझे मेरा नाम याद नहीं
अकबर मासूम
यही सोच कर इक्तिफ़ा चार पर कर गए शैख़-जी
अकबर हैदराबादी
वो पास हो के दूर है तो दूर हो के पास
अकबर हैदराबादी
रुत बदली तो ज़मीं के चेहरे का ग़ाज़ा भी बदला
अकबर हैदराबादी
रस्ते ही में हो जाती हैं बातें बस दो-चार
अकबर हैदराबादी
पहुँच के जो सर-ए-मंज़िल बिछड़ गया मुझ से
अकबर हैदराबादी
न जाने कितनी बस्तियाँ उजड़ के रह गईं
अकबर हैदराबादी
मुश्किल ही से कर लेती है दुनिया उसे क़ुबूल
अकबर हैदराबादी
मुसाफ़िरत का वलवला सियाहतों का मश्ग़ला
अकबर हैदराबादी
मुबहम थे सब नुक़ूश नक़ाबों की धुँद में
अकबर हैदराबादी
मिरी शिकस्त भी थी मेरी ज़ात से मंसूब
अकबर हैदराबादी
लबों पर तबस्सुम तो आँखों में आँसू थी धूप एक पल में तो इक पल में बारिश
अकबर हैदराबादी
ख़ुद-परस्ती ख़ुदा न बन जाए
अकबर हैदराबादी
हिम्मत वाले पल में बदल देते हैं दुनिया को
अकबर हैदराबादी
हर दुकाँ अपनी जगह हैरत-ए-नज़्ज़ारा है
अकबर हैदराबादी
दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से
अकबर हैदराबादी
छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी
अकबर हैदराबादी
चराग़-ए-राहगुज़र लाख ताबनाक सही
अकबर हैदराबादी
बुरे भले में फ़र्क़ है ये जानते हैं सब मगर
अकबर हैदराबादी
बे-साल-ओ-सिन ज़मानों में फैले हुए हैं हम
अकबर हैदराबादी
आँखों को देखने का सलीक़ा जब आ गया
अकबर हैदराबादी
आँख में आँसू का और दिल में लहू का काल है
अकबर हैदराबादी
कोई नादीदा उँगली उठ रही है
अकबर हमीदी