Couplets Poetry (page 552)
कितने महबूब घरों से गए किस को मालूम
अख्तर लख़नवी
अब भी आती है तिरी याद प इस कर्ब के साथ
अख़तर इमाम रिज़वी
तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया
अख़्तर हुसैन जाफ़री
शाख़-ए-तन्हाई से फिर निकली बहार-ए-फ़स्ल-ए-ज़ात
अख़्तर हुसैन जाफ़री
दिल जहाँ बात करे दिल ही जहाँ बात सुने
अख़्तर हुसैन जाफ़री
ज़माना अपनी उर्यानी पे ख़ूँ रोएगा कब तक
अख़्तर होशियारपुरी
ये सरगुज़िश्त-ए-ज़माना ये दास्तान-ए-हयात
अख़्तर होशियारपुरी
वो शायद कोई सच्ची बात कह दे
अख़्तर होशियारपुरी
वो कम-सुख़न था मगर ऐसा कम-सुख़न भी न था
अख़्तर होशियारपुरी
तमाम हर्फ़ मिरे लब पे आ के जम से गए
अख़्तर होशियारपुरी
न जाने लोग ठहरते हैं वक़्त-ए-शाम कहाँ
अख़्तर होशियारपुरी
मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र
अख़्तर होशियारपुरी
मैं ने जो ख़्वाब अभी देखा नहीं है 'अख़्तर'
अख़्तर होशियारपुरी
मैं अपनी ज़ात की तशरीह करता फिरता था
अख़्तर होशियारपुरी
लोग नज़रों को भी पढ़ लेते हैं
अख़्तर होशियारपुरी
क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं
अख़्तर होशियारपुरी
कच्चे मकान जितने थे बारिश में बह गए
अख़्तर होशियारपुरी
कब धूप चली शाम ढली किस को ख़बर है
अख़्तर होशियारपुरी
हवा में ख़ुशबुएँ मेरी पहचान बन गई थीं
अख़्तर होशियारपुरी
हमें ख़बर है कोई हम-सफ़र न था फिर भी
अख़्तर होशियारपुरी
गुज़रते वक़्त ने क्या क्या न चारा-साज़ी की
अख़्तर होशियारपुरी
धूप की गरमी से ईंटें पक गईं फल पक गए
अख़्तर होशियारपुरी
चमन के रंग-ओ-बू ने इस क़दर धोका दिया मुझ को
अख़्तर होशियारपुरी
'अख़्तर' गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँ न चौंक
अख़्तर होशियारपुरी
ऐ जलती रुतो गवाह रहना
अख़्तर होशियारपुरी
जिस ने दुनिया भर के ग़म अपनाए थे
अख़्तर फ़िरोज़
कीजिए किस किस से आख़िर ना-शनासी का गिला
अख़तर बस्तवी
बरसों से इस में फल नहीं आए तो क्या हुआ
अख़तर बस्तवी
आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
अख़तर बस्तवी
चुप रहो तो पूछता है ख़ैर है
अख़्तर अंसारी अकबराबादी