Couplets Poetry (page 550)

किस जुर्म-ए-आरज़ू की सज़ा है ये ज़िंदगी

अख़्तर सईद ख़ान

खुली आँखों नज़र आता नहीं कुछ

अख़्तर सईद ख़ान

कौन जीने के लिए मरता रहे

अख़्तर सईद ख़ान

इसी मोड़ पर हम हुए थे जुदा

अख़्तर सईद ख़ान

हम ने माना इक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा

अख़्तर सईद ख़ान

हर मौज गले लग के ये कहती है ठहर जाओ

अख़्तर सईद ख़ान

दुश्मन-ए-जाँ ही सही साथ तो इक उम्र का है

अख़्तर सईद ख़ान

चराग़ ले के उसे ढूँडने चला हूँ मैं

अख़्तर सईद ख़ान

बंद रक्खोगे दरीचे दिल के यारो कब तलक

अख़्तर सईद ख़ान

बंद कर दे कोई माज़ी का दरीचा मुझ पर

अख़्तर सईद ख़ान

बहुत क़रीब रही है ये ज़िंदगी हम से

अख़्तर सईद ख़ान

बहें न आँख से आँसू तो नग़्मगी बे-सूद

अख़्तर सईद ख़ान

आ कि मैं देख लूँ खोया हुआ चेहरा अपना

अख़्तर सईद ख़ान

यहीं कहीं पे कोई शहर बस रहा था अभी

अख़्तर रज़ा सलीमी

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

अख़्तर रज़ा सलीमी

तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद

अख़्तर रज़ा सलीमी

सुना गया है यहाँ शहर बस रहा था कोई

अख़्तर रज़ा सलीमी

पहले तराशा काँच से उस ने मिरा वजूद

अख़्तर रज़ा सलीमी

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

अख़्तर रज़ा सलीमी

जिस्मों से निकल रहे हैं साए

अख़्तर रज़ा सलीमी

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर

अख़्तर रज़ा सलीमी

गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं

अख़्तर रज़ा सलीमी

इक आग हमारी मुंतज़िर है

अख़्तर रज़ा सलीमी

दिल-ओ-निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का

अख़्तर रज़ा सलीमी

दिल ओ निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का

अख़्तर रज़ा सलीमी

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती

अख़्तर रज़ा सलीमी

आए अदम से एक झलक देखने तिरी

अख़्तर रज़ा सलीमी

न मिज़ाज-ए-नाज़-ए-जल्वा कभी पा सकीं निगाहें

अख़्तर ओरेनवी

मिरी आरज़ू की तस्कीं न करम में ने सितम में

अख़्तर ओरेनवी

मैं मुंतज़िर हूँ तेरी तमन्ना लिए हुए

अख़्तर ओरेनवी