Couplets Poetry (page 549)
इक वो कि आरज़ुओं पे जीते हैं उम्र भर
अख़्तर शीरानी
इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम
अख़्तर शीरानी
दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
अख़्तर शीरानी
दिल में लेता है चुटकियाँ कोई
अख़्तर शीरानी
चमन में रहने वालों से तो हम सहरा-नशीं अच्छे
अख़्तर शीरानी
भुला बैठे हो हम को आज लेकिन ये समझ लेना
अख़्तर शीरानी
बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले
अख़्तर शीरानी
ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए
अख़्तर शीरानी
अब वो बातें न वो रातें न मुलाक़ातें हैं
अख़्तर शीरानी
अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी
अख़्तर शीरानी
अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें
अख़्तर शीरानी
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
अख़्तर शीरानी
लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर
अख़्तर शेख़
ये मुंसिफ़ान-ए-शहर हैं ये पासबान-ए-शहर
अख़तर शाहजहाँपुरी
मुझे हासिल कमाल-ए-गुफ़्तुगू है
अख्तर सईदी
कभी ख़याल की सूरत कभी सबा की तरह
अख्तर सईदी
ज़िंदगी क्या हुए वो अपने ज़माने वाले
अख़्तर सईद ख़ान
ज़िंदगी छीन ले बख़्शी हुई दौलत अपनी
अख़्तर सईद ख़ान
ज़माना इश्क़ के मारों को मात क्या देगा
अख़्तर सईद ख़ान
ये दश्त वो है जहाँ रास्ता नहीं मिलता
अख़्तर सईद ख़ान
ये बे-सबब नहीं आए हैं आँख में आँसू
अख़्तर सईद ख़ान
ये बस्ती इस क़दर सुनसान कब थी
अख़्तर सईद ख़ान
तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती है
अख़्तर सईद ख़ान
निगाहें मुंतज़िर हैं किस की दिल को जुस्तुजू क्या है
अख़्तर सईद ख़ान
ना-उमीदी हर्फ़-ए-तोहमत ही सही क्या कीजिए
अख़्तर सईद ख़ान
मुझे अब देखती है ज़िंदगी यूँ बे-नियाज़ाना
अख़्तर सईद ख़ान
मिरा फ़साना हर इक दिल का माजरा तो न था
अख़्तर सईद ख़ान
मैं सफ़र में हूँ मगर सम्त-ए-सफ़र कोई नहीं
अख़्तर सईद ख़ान
किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में
अख़्तर सईद ख़ान
किस को फ़ुर्सत थी कि 'अख़्तर' देखता मेरी तरफ़
अख़्तर सईद ख़ान