Couplets Poetry (page 547)

जैसे पानी पे नक़्श हो कोई

अकरम नक़्क़ाश

इश्क़ इक ऐसी हवेली है कि जिस से बाहर

अकरम नक़्क़ाश

हज़ार कारवाँ यूँ तो हैं मेरे साथ मगर

अकरम नक़्क़ाश

हवा भी चाहिए और रौशनी भी

अकरम नक़्क़ाश

बार-हा तू ने ख़्वाब दिखलाए

अकरम नक़्क़ाश

बदन मल्बूस में शोला सा इक लर्ज़ां क़रीन-ए-जाँ

अकरम नक़्क़ाश

अंधा सफ़र है ज़ीस्त किसे छोड़ दे कहाँ

अकरम नक़्क़ाश

कोई इलाज-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी बता वाइज़

अख़्तर ज़ियाई

दफ़अतन आँधियों ने रुख़ बदला

अख़्तर ज़ियाई

भुला चुके हैं ज़मीन ओ ज़माँ के सब क़िस्से

अख़्तर ज़ियाई

आस डूबी तो दिल हुआ रौशन

अख़्तर ज़ियाई

ये काएनात मिरे सामने है मिस्ल-ए-बिसात

अख़्तर उस्मान

वक़्त अब दस्तरस में है 'अख़्तर'

अख़्तर उस्मान

शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे

अख़्तर उस्मान

तेरा हर राज़ छुपाए हुए बैठा है कोई

अख़्तर सिद्दीक़ी

वो मुस्कुरा के कोई बात कर रहा था 'शुमार'

अख्तर शुमार

तू ने एक उम्र के बाद पूछा है हाल-ए-दिल

अख्तर शुमार

पहाड़ भाँप रहा था मिरे इरादे को

अख्तर शुमार

मुद्दतों में आज दिल ने फ़ैसला आख़िर दिया

अख्तर शुमार

मेरी रुस्वाई अगर साथ न देती मेरा

अख्तर शुमार

मिरी निगाह की वुसअत भी इस में शामिल कर

अख्तर शुमार

मैं ज़िंदगी के सफ़र में था मश्ग़ला उस का

अख्तर शुमार

मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने

अख्तर शुमार

मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ

अख्तर शुमार

अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया

अख्तर शुमार

अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं

अख्तर शुमार

ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब

अख़्तर शीरानी

याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो

अख़्तर शीरानी

वो अगर आ न सके मौत ही आई होती

अख़्तर शीरानी

उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ

अख़्तर शीरानी