Couplets Poetry (page 545)

अफ़्साना मोहब्बत का पूरा हो तो कैसे हो

अलीम मसरूर

ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी

अलीम अख़्तर

वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह

अलीम अख़्तर

मुझे तो कल भी न था उन पर इख़्तियार कोई

अलीम अख़्तर

मुझे आँखें दिखाएगी भला क्या गर्दिश-ए-दौराँ

अलीम अख़्तर

मेरी बेताबियों से घबरा कर

अलीम अख़्तर

मेरे सुकून-ए-क़ल्ब को ले कर चले गए

अलीम अख़्तर

मआल-ए-ज़ब्त-ए-पैहम हो गई है

अलीम अख़्तर

हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब

अलीम अख़्तर

दर्द का फिर मज़ा है जब 'अख़्तर'

अलीम अख़्तर

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

अलीम अख़्तर

तुयूर थे जो घोंसलों में पैकरों के उड़ गए

अलीम अफ़सर

सदाएँ जिस्म की दीवार पार करती हैं

अलीम अफ़सर

किराया-दार बदलना तो उस का शेवा था

अलीम अफ़सर

ये कहना तुम से बिछड़ कर बिखर गया 'तिश्ना'

आलमताब तिश्ना

ये कहना हार न मानी कभी अंधेरों से

आलमताब तिश्ना

विसाल-ए-यार की ख़्वाहिश में अक्सर

आलमताब तिश्ना

तमाम उम्र की दीवानगी के ब'अद खुला

आलमताब तिश्ना

शोरीदगी को हैं सभी आसूदगी नसीब

आलमताब तिश्ना

पहले निसाब-ए-अक़्ल हुआ हम से इंतिसाब

आलमताब तिश्ना

नफ़रत भी उसी से है परस्तिश भी उसी की

आलमताब तिश्ना

मा-सिवा-ए-कार-ए-आह-ओ-अश्क क्या है इश्क़ में

आलमताब तिश्ना

मैं जब भी घर से निकलता हूँ रात को तन्हा

आलमताब तिश्ना

इस राह-ए-मोहब्बत में तू साथ अगर होता

आलमताब तिश्ना

हम अपने इश्क़ की अब और क्या शहादत दें

आलमताब तिश्ना

हर दौर में रहा यही आईन-ए-मुंसिफ़ी

आलमताब तिश्ना

हद हो गई थी हम से मोहब्बत में कुफ़्र की

आलमताब तिश्ना

बन के ताबीर भी आया होता

आलमताब तिश्ना

वो उन का व'अदा वो ईफ़ा-ए-अहद का आलम

आलम मुज़फ्फ़र नगरी

मिलेगा ज़ुल्फ़-ए-आज़ादी उन्हें क्या मौसम-ए-गुल में

आलम मुज़फ्फ़र नगरी