Couplets Poetry (page 544)
रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है
अली अहमद जलीली
फिरता हूँ अपना नक़्श-ए-क़दम ढूँडता हुआ
अली अहमद जलीली
नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो क्या ग़म था
अली अहमद जलीली
लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे
अली अहमद जलीली
क्या इसी वास्ते सींचा था लहू से अपने
अली अहमद जलीली
किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रक्खो
अली अहमद जलीली
काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से
अली अहमद जलीली
हम ने देखा है ज़माने का बदलना लेकिन
अली अहमद जलीली
ग़म से मंसूब करूँ दर्द का रिश्ता दे दूँ
अली अहमद जलीली
एक तहरीर जो उस के हाथों की थी
अली अहमद जलीली
दूर तक दिल में दिखाई नहीं देता कोई
अली अहमद जलीली
बन रहे हैं सतह-ए-दिल पर दाएरे
अली अहमद जलीली
आँधियों का काम चलना है ग़रज़ इस से नहीं
अली अहमद जलीली
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
अलीना इतरत
कुछ कड़े टकराओ दे जाती है अक्सर रौशनी
अलीना इतरत
किसी के वास्ते तस्वीर-ए-इंतिज़ार थे हम
अलीना इतरत
हम हवा से बचा रहे थे जिन्हें
अलीना इतरत
ब'अद मुद्दत मुझे नींद आई बड़े चैन की नींद
अलीना इतरत
अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है
अलीना इतरत
अजब सी कशमकश तमाम उम्र साथ साथ थी
अलीना इतरत
अभी तो चाक पे जारी है रक़्स मिट्टी का
अलीना इतरत
मैं फिर रहा हूँ शहर में सड़कों पे ग़ालिबन
अलीम सबा नवेदी
लहू की सूखी हुई झील में उतर कर यूँ
अलीम सबा नवेदी
घर जल रहा था सब के लबों पर धुआँ सा था
अलीम सबा नवेदी
ज़माने को दूँ क्या कि दामन में मेरे
अलीम मसरूर
उठ के उस बज़्म से आ जाना कुछ आसान न था
अलीम मसरूर
निकले तिरी महफ़िल से तो साथ न था कोई
अलीम मसरूर
जाने क्या महफ़िल-ए-परवाना में देखा उस ने
अलीम मसरूर
भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया
अलीम मसरूर
अंजाम-ए-कशाकश होगा कुछ देखें तो तमाशा दीवाने
अलीम मसरूर