Couplets Poetry (page 546)

तमाम रंग अधूरे लगे तिरे आगे

आलम ख़ुर्शीद

तहज़ीब की ज़ंजीर से उलझा रहा मैं भी

आलम ख़ुर्शीद

तब्दीलियों का नश्शा मुझ पर चढ़ा हुआ है

आलम ख़ुर्शीद

रात गए अक्सर दिल के वीरानों में

आलम ख़ुर्शीद

पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं

आलम ख़ुर्शीद

माँगती है अब मोहब्बत अपने होने का सुबूत

आलम ख़ुर्शीद

मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई

आलम ख़ुर्शीद

लकीर खींच के बैठी है तिश्नगी मिरी

आलम ख़ुर्शीद

कुछ रस्ते मुश्किल ही अच्छे लगते हैं

आलम ख़ुर्शीद

कोई सूरत भी नहीं मिलती किसी सूरत में

आलम ख़ुर्शीद

किसी को ढूँडते हैं हम किसी के पैकर में

आलम ख़ुर्शीद

किसी के रस्ते पे कैसे नज़रें जमाए रक्खूँ

आलम ख़ुर्शीद

कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है

आलम ख़ुर्शीद

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

आलम ख़ुर्शीद

इस फ़ैसले से ख़ुश हैं अफ़राद घर के सारे

आलम ख़ुर्शीद

हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं

आलम ख़ुर्शीद

गुज़िश्ता रुत का अमीं हूँ नए मकान में भी

आलम ख़ुर्शीद

दिल रोता है चेहरा हँसता रहता है

आलम ख़ुर्शीद

चारों तरफ़ हैं शोले हम-साए जल रहे हैं

आलम ख़ुर्शीद

बहुत सुकून से रहते थे हम अँधेरे में

आलम ख़ुर्शीद

अपनी कहानी दिल में छुपा कर रखते हैं

आलम ख़ुर्शीद

अहल-ए-हुनर की आँखों में क्यूँ चुभता रहता हूँ

आलम ख़ुर्शीद

अब कितनी कार-आमद जंगल में लग रही है

आलम ख़ुर्शीद

आए हो नुमाइश में ज़रा ध्यान भी रखना

आलम ख़ुर्शीद

ये पूछ आ के कौन नसीबों जिया है दिल

अकरम नक़्क़ाश

ये कौन सी जगह है ये बस्ती है कौन सी

अकरम नक़्क़ाश

रख्खूँ कहाँ पे पाँव बढ़ाऊँ किधर क़दम

अकरम नक़्क़ाश

मयस्सर से ज़ियादा चाहता है

अकरम नक़्क़ाश

कुछ तो इनायतें हैं मिरे कारसाज़ की

अकरम नक़्क़ाश

जियूँगा मैं तिरी साँसों में जब तक

अकरम नक़्क़ाश