Couplets Poetry (page 548)
उस के अहद-ए-शबाब में जीना
अख़्तर शीरानी
उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है
अख़्तर शीरानी
उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं
अख़्तर शीरानी
थक गए हम करते करते इंतिज़ार
अख़्तर शीरानी
तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
अख़्तर शीरानी
रात भर उन का तसव्वुर दिल को तड़पाता रहा
अख़्तर शीरानी
पलट सी गई है ज़माने की काया
अख़्तर शीरानी
मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन
अख़्तर शीरानी
मुझे दोनों जहाँ में एक वो मिल जाएँ गर 'अख़्तर'
अख़्तर शीरानी
मुद्दतें हो गईं बिछड़े हुए तुम से लेकिन
अख़्तर शीरानी
मुबारक मुबारक नया साल आया
अख़्तर शीरानी
मोहब्बत के इक़रार से शर्म कब तक
अख़्तर शीरानी
मिट चले मेरी उमीदों की तरह हर्फ़ मगर
अख़्तर शीरानी
माना कि सब के सामने मिलने से है हिजाब
अख़्तर शीरानी
लॉन्ड्री खोली थी उस के इश्क़ में
अख़्तर शीरानी
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
अख़्तर शीरानी
कुछ इस तरह से याद आते रहे हो
अख़्तर शीरानी
कूचा-ए-हुस्न छुटा तो हुए रुस्वा-ए-शराब
अख़्तर शीरानी
किया है आने का वादा तो उस ने
अख़्तर शीरानी
किसी मग़रूर के आगे हमारा सर नहीं झुकता
अख़्तर शीरानी
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
अख़्तर शीरानी
काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें
अख़्तर शीरानी
काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें
अख़्तर शीरानी
इश्क़ को नग़्मा-ए-उम्मीद सुना दे आ कर
अख़्तर शीरानी
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अख़्तर शीरानी
इन वफ़ादारी के वादों को इलाही क्या हुआ
अख़्तर शीरानी
है क़यामत तिरे शबाब का रंग
अख़्तर शीरानी
ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना
अख़्तर शीरानी
ग़म-ए-आक़िबत है न फ़िक्र-ए-ज़माना
अख़्तर शीरानी
ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी
अख़्तर शीरानी