Couplets Poetry (page 543)
फ़रेब-ए-जल्वा कहाँ तक ब-रू-ए-कार रहे
अली अख़्तर अख़्तर
चटक में ग़ुंचे की वो सौत-ए-जाँ-फ़ज़ा तो नहीं
अली अख़्तर अख़्तर
ज़र्द फूलों में बसा ख़्वाब में रहने वाला
अली अकबर नातिक़
वो शख़्स अमर है, जो पीवेगा दो चाँदों के नूर
अली अकबर नातिक़
सर्द रातों की हवा में उड़ते पत्तों के मसील
अली अकबर नातिक़
मुख़्तसर बात थी, फैली क्यूँ सबा की मानिंद
अली अकबर नातिक़
कोई न रस्ता नाप सका है, रेत पे चलने वालों का
अली अकबर नातिक़
किसी का साया रह गया गली के ऐन मोड़ पर
अली अकबर नातिक़
इतना आसाँ नहीं पानी से शबीहें धोना
अली अकबर नातिक़
हिजाब आ गया था मुझ को दिल के इज़्तिराब पर
अली अकबर नातिक़
ग़ुबार-ए-शहर में उसे न ढूँड जो ख़िज़ाँ की शब
अली अकबर नातिक़
फ़ाख़ताएँ बोलती हैं बाजरों के देस में
अली अकबर नातिक़
धूप फैली तो कहा दीवार ने झुक कर मुझे
अली अकबर नातिक़
चराग़ बाँटने वालों प हैरतें न करो
अली अकबर नातिक़
बस्तियों वाले तो ख़ुद ओढ़ के पत्ते, सोए
अली अकबर नातिक़
आसमाँ के रौज़नों से लौट आता था कभी
अली अकबर नातिक़
आधे पेड़ पे सब्ज़ परिंदे आधा पेड़ आसेबी है
अली अकबर नातिक़
आँखें थीं वीरान नज़र कैसे आता
अली अकबर मंसूर
ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे
अली अकबर अब्बास
उसी पेड़ के नीचे दफ़्न भी होना होगा
अली अकबर अब्बास
मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में
अली अकबर अब्बास
मैं भरी सड़कों पे भी बे-चाप चलने लग गया
अली अकबर अब्बास
मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ
अली अकबर अब्बास
कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया
अली अकबर अब्बास
फ़रेब-ए-माह-ओ-अंजुम से निकल जाएँ तो अच्छा है
अली अकबर अब्बास
इक सदा की सूरत हम इस हवा में ज़िंदा हैं
अली अकबर अब्बास
अपना आप नहीं है सब कुछ अपने आप से निकलो
अली अकबर अब्बास
ऐ शाएर! तेरा दर्द बड़ा ऐ शाएर! तेरी सोच बड़ी
अली अकबर अब्बास
ये ख़ून रंग-ए-चमन में बदल भी सकता है
अली अहमद जलीली
उस शजर के साए में बैठा हूँ मैं
अली अहमद जलीली