Couplets Poetry (page 551)
कितने ताबाँ थे वो लम्हात तिरे पहलू में
अख़्तर ओरेनवी
जुनूँ भी ज़हमत ख़िरद भी ल'अनत है ज़ख़्म-ए-दिल की दवा मोहब्बत
अख़्तर ओरेनवी
वो ज़हर देता तो बद-नाम हो गया होता
अख़्तर नज़्मी
नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैं ने
अख़्तर नज़्मी
मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता
अख़्तर नज़्मी
अब नहीं लौट के आने वाला
अख़्तर नज़्मी
वफ़ा करो जफ़ा मिले भला करो बुरा मिले
अख़तर मुस्लिमी
उस को भड़काऊ न दामन की हवाएँ दे कर
अख़तर मुस्लिमी
तुम्हारी बज़्म की यूँ आबरू बढ़ा के चले
अख़तर मुस्लिमी
थीं तुम्हारी जिस पे नवाज़िशें कभी तुम भी जिस पे थे मेहरबाँ
अख़तर मुस्लिमी
सुन के रूदाद-ए-अलम मेरी वो हँस कर बोले
अख़तर मुस्लिमी
सब्र-ओ-क़रार-ए-दिल मिरे जाने कहाँ चले गए
अख़तर मुस्लिमी
रह-ए-वफ़ा में लुटा कर मता-ए-क़ल्ब-ओ-जिगर
अख़तर मुस्लिमी
मुझ को मंज़ूर नहीं इश्क़ को रुस्वा करना
अख़तर मुस्लिमी
मेरे किरदार में मुज़्मर है तुम्हारा किरदार
अख़तर मुस्लिमी
मिरे दिल पे हाथ रख कर मुझे देने वाले तस्कीं
अख़तर मुस्लिमी
लज़्ज़त-ए-दर्द मिली जुर्म-ए-मोहब्बत में उसे
अख़तर मुस्लिमी
कुछ इस तरह के बहारों ने गुल खिलाए हैं
अख़तर मुस्लिमी
ख़ुशी ही शर्त नहीं लुत्फ़-ए-ज़िंदगी के लिए
अख़तर मुस्लिमी
जो बा-ख़बर थे वो देते रहे फ़रेब मुझे
अख़तर मुस्लिमी
इक़रार-ए-मोहब्बत तो बड़ी बात है लेकिन
अख़तर मुस्लिमी
इंसाफ़ के पर्दे में ये क्या ज़ुल्म है यारो
अख़तर मुस्लिमी
हर शाख़-ए-चमन है अफ़्सुर्दा हर फूल का चेहरा पज़मुर्दा
अख़तर मुस्लिमी
हाँ ये भी तरीक़ा अच्छा है तुम ख़्वाब में मिलते हो मुझ से
अख़तर मुस्लिमी
फ़रेब-ख़ुर्दा है इतना कि मेरे दिल को अभी
अख़तर मुस्लिमी
एक ही अंजाम है ऐ दोस्त हुस्न ओ इश्क़ का
अख़तर मुस्लिमी
दी उस ने मुझ को जुर्म-ए-मोहब्बत की वो सज़ा
अख़तर मुस्लिमी
देहात के बसने वाले तो इख़्लास के पैकर होते हैं
अख़तर मुस्लिमी
अश्क वो है जो रहे आँख में गौहर बन कर
अख़तर मुस्लिमी
अजीब उलझन में तू ने डाला मुझे भी ऐ गर्दिश-ए-ज़माना
अख़तर मुस्लिमी