ग़म-ए-हयात पे ख़ंदाँ हैं तेरे दीवाने

ग़म-ए-हयात पे ख़ंदाँ हैं तेरे दीवाने

अजीब साहब-ए-इरफ़ाँ हैं तेरे दीवाने

हर एक ज़र्रा-ए-सहरा है आईना-ख़ाना

हुजूम-ए-जल्वा से हैराँ हैं तेरे दीवाने दीवाने

न अपने होश की पर्वा न अपने दर्द का फ़िक्र

ग़म-ए-ज़मीं से परेशाँ हैं तेरे दीवाने

कहाँ ये होश कि औरों की ज़िंदगी पे हँसें

ख़ुद अपने हाल पे ख़ंदाँ हैं तेरे दीवाने

हुजूम-ए-अश्क में छलका रहे हैं पैमाना

हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ हैं तेरे दीवाने

बहार आते ही क्या जाने उन पे क्या गुज़री

कि ख़ुद से दस्त-ओ-गरेबाँ हैं तेरे दीवाने

कभी तो इक निगह-ए-जाँ-नवाज़ हो जाए

हनूज़ कुश्ता-ए-अरमाँ हैं तेरे दीवाने

निशात-ओ-दर्द में देखा है मैं ने 'दर्शन' को

हर एक हाल में शादाँ हैं तेरे दीवाने

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