Islamic Poetry (page 13)
कुछ बात ही थी ऐसी कि थामे जिगर गए
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
पत्थरो आज मिरे सर पे बरसते क्यूँ हो
हकीम नासिर
ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद
हकीम नासिर
जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा है
हकीम नासिर
बाद-ए-सरसर है नसीम-ए-गुलिस्ताँ मेरे लिए
हकीम मोहम्मद हुसैन अहक़र
सारे मामूलात में इक ताज़ा गर्दिश चाहिए
हकीम मंज़ूर
हो आँख अगर ज़िंदा गुज़रती है न क्या क्या
हकीम मंज़ूर
छोड़ कर बार-ए-सदा वो बे-सदा हो जाएगा
हकीम मंज़ूर
मक़्सद-ए-हयात
हाजी लक़ लक़
बहिश्त-ए-बरीँ
हाजी लक़ लक़
ये महव हुए देख के बे-साख़्ता-पन को
हैरत इलाहाबादी
अंदर की दुनियाएँ मिला के एक नगर हो जाएँ
हैदर क़ुरैशी
मता-ए-दर्द का ख़ूगर मिरी तलाश में है
हैदर अली जाफ़री
सुन तो सही जहाँ में है तेरा अफ़्साना क्या
हैदर अली आतिश
शब-ए-वस्ल थी चाँदनी का समाँ था
हैदर अली आतिश
न जब तक कोई हम-प्याला हो मैं मय नहीं पीता
हैदर अली आतिश
कूचा-ए-यार में हो रौशनी अपने दम की
हैदर अली आतिश
कोई बुत-ख़ाने को जाता है कोई काबे को
हैदर अली आतिश
ख़ुदा दराज़ करे उम्र चर्ख़-ए-नीली की
हैदर अली आतिश
फ़स्ल-ए-बहार आई पियो सूफ़ियो शराब
हैदर अली आतिश
दिल की कुदूरतें अगर इंसाँ से दूर हों
हैदर अली आतिश
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए
हैदर अली आतिश
भरा है शीशा-ए-दिल को नई मोहब्बत से
हैदर अली आतिश
बरहमन खोले हीगा बुत-कदा का दरवाज़ा
हैदर अली आतिश
ऐ सनम जिस ने तुझे चाँद सी सूरत दी है
हैदर अली आतिश
ज़िंदे वही हैं जो कि हैं तुम पर मरे हुए
हैदर अली आतिश
ये किस रश्क-ए-मसीहा का मकाँ है
हैदर अली आतिश
या-अली कह कर बुत-ए-पिंदार तोड़ा चाहिए
हैदर अली आतिश
वो नाज़नीं ये नज़ाकत में कुछ यगाना हुआ
हैदर अली आतिश
वहशी थे बू-ए-गुल की तरह इस जहाँ में हम
हैदर अली आतिश