Couplets Poetry (page 398)

उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम इसे शिकवा समझ कर किस लिए शरमा गए

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुझ को पा कर भी न कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल

फ़िराक़ गोरखपुरी

तू याद आया तिरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए

फ़िराक़ गोरखपुरी

तिरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है

फ़िराक़ गोरखपुरी

तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और

फ़िराक़ गोरखपुरी

तेरे आने की क्या उमीद मगर

फ़िराक़ गोरखपुरी

तबीअत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में

फ़िराक़ गोरखपुरी

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग

फ़िराक़ गोरखपुरी

शामें किसी को माँगती हैं आज भी 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास

फ़िराक़ गोरखपुरी

सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं

फ़िराक़ गोरखपुरी

साँस लेती है वो ज़मीन 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

रोने वाले हुए चुप हिज्र की दुनिया बदली

फ़िराक़ गोरखपुरी

रोने को तो ज़िंदगी पड़ी है

फ़िराक़ गोरखपुरी

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए

फ़िराक़ गोरखपुरी

रात भी नींद भी कहानी भी

फ़िराक़ गोरखपुरी

क़ुर्ब ही कम है न दूरी ही ज़ियादा लेकिन

फ़िराक़ गोरखपुरी

पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए

फ़िराक़ गोरखपुरी

पाल ले इक रोग नादाँ ज़िंदगी के वास्ते

फ़िराक़ गोरखपुरी

न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद

फ़िराक़ गोरखपुरी

मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू ज़बाँ

फ़िराक़ गोरखपुरी

मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती

फ़िराक़ गोरखपुरी

मौत का भी इलाज हो शायद

फ़िराक़ गोरखपुरी

मंज़िलें गर्द के मानिंद उड़ी जाती हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर

फ़िराक़ गोरखपुरी

मैं हूँ दिल है तन्हाई है

फ़िराक़ गोरखपुरी

मैं देर तक तुझे ख़ुद ही न रोकता लेकिन

फ़िराक़ गोरखपुरी