Couplets Poetry (page 400)

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी

'ग़ालिब' ओ 'मीर' 'मुसहफ़ी'

फ़िराक़ गोरखपुरी

'फ़िराक़' दौड़ गई रूह सी ज़माने में

फ़िराक़ गोरखपुरी

फ़ज़ा तबस्सुम-ए-सुब्ह-ए-बहार थी लेकिन

फ़िराक़ गोरखपुरी

इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में

फ़िराक़ गोरखपुरी

एक रंगीनी ज़ाहिर है गुलिस्ताँ में अगर

फ़िराक़ गोरखपुरी

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें

फ़िराक़ गोरखपुरी

दिल-दुखे रोए हैं शायद इस जगह ऐ कू-ए-दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी

देवताओं का ख़ुदा से होगा काम

फ़िराक़ गोरखपुरी

देख रफ़्तार-ए-इंक़लाब 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं

फ़िराक़ गोरखपुरी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

बहुत हसीन है दोशीज़गी-ए-हुस्न मगर

फ़िराक़ गोरखपुरी

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम

फ़िराक़ गोरखपुरी

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात ओ ममात की

फ़िराक़ गोरखपुरी

बद-गुमाँ हो के मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे

फ़िराक़ गोरखपुरी

असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का

फ़िराक़ गोरखपुरी

ऐ सोज़-ए-इश्क़ तू ने मुझे क्या बना दिया

फ़िराक़ गोरखपुरी

अब याद-ए-रफ़्तगाँ की भी हिम्मत नहीं रही

फ़िराक़ गोरखपुरी

अब तो उन की याद भी आती नहीं

फ़िराक़ गोरखपुरी

आँखों में जो बात हो गई है

फ़िराक़ गोरखपुरी

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो

फ़िराक़ गोरखपुरी

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

यक़ीन-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा हमें बावर नहीं आता

फ़िगार उन्नावी

उन पे क़ुर्बान हर ख़ुशी कर दी

फ़िगार उन्नावी

तिरे ग़म के सामने कुछ ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं है

फ़िगार उन्नावी

शिकस्त-ए-दिल की हर आवाज़ हश्र-आसार होती है

फ़िगार उन्नावी

सर-ए-महफ़िल हमारे दिल को लूटा चश्म-ए-साक़ी ने

फ़िगार उन्नावी

साक़ी ने निगाहों से पिला दी है ग़ज़ब की

फ़िगार उन्नावी

क़दम क़दम पे दोनों जुर्म-ए-इश्क़ में शरीक हैं

फ़िगार उन्नावी