Couplets Poetry (page 401)

क़दम अपने हरीम-ए-नाज़ में इस शौक़ से रखना

फ़िगार उन्नावी

फूलों को गुलिस्ताँ में कब रास बहार आई

फ़िगार उन्नावी

परतव-ए-हुस्न से ज़र्रे भी बने आईने

फ़िगार उन्नावी

मेरी जबीन-ए-शौक़ ने सज्दे जहाँ किए

फ़िगार उन्नावी

मायूस दिलों को अब छेड़ो भी तो क्या हासिल

फ़िगार उन्नावी

महफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ तेरी ही बज़्म-ए-नाज़ है

फ़िगार उन्नावी

क्या मिला अर्ज़-ए-मुद्दआ से 'फ़िगार'

फ़िगार उन्नावी

किसी से शिकवा-ए-महरूमी-ए-नियाज़ न कर

फ़िगार उन्नावी

किस काम का ऐसा दिल जिस में रंजिश है ग़ुबार है कीना है

फ़िगार उन्नावी

का'बे में हो या बुत-ख़ाने में होने को तो सर ख़म होता है

फ़िगार उन्नावी

काबा भी घर अपना है सनम-ख़ाना भी अपना

फ़िगार उन्नावी

हसरत-ए-दिल ना-मुकम्मल है किताब-ए-ज़िंदगी

फ़िगार उन्नावी

हैं ये जज़्बात मिरे दर्द भरे दिल के फ़िगार

फ़िगार उन्नावी

ग़म-ओ-अलम से जो ताबीर की ख़ुशी मैं ने

फ़िगार उन्नावी

फ़ज़ा का तंग होना फ़ितरत-ए-आज़ाद से पूछो

फ़िगार उन्नावी

इक तेरा आसरा है फ़क़त ऐ ख़याल-ए-दोस्त

फ़िगार उन्नावी

एक ख़्वाब-ओ-ख़याल है दुनिया

फ़िगार उन्नावी

दीवाने को मजाज़-ओ-हक़ीक़त से क्या ग़रज़

फ़िगार उन्नावी

दिल मिरा शाकी-ए-जफ़ा न हुआ

फ़िगार उन्नावी

दिल की बुनियाद पे ता'मीर कर ऐवान-ए-हयात

फ़िगार उन्नावी

दिल है मिरा रंगीनी-ए-आग़ाज़ पे माइल

फ़िगार उन्नावी

दिल चोट सहे और उफ़ न करे ये ज़ब्त की मंज़िल है लेकिन

फ़िगार उन्नावी

छुप गया दिन क़दम बढ़ा राही

फ़िगार उन्नावी

ब-क़द्र-ए-ज़ौक़ मेरे अश्क-ए-ग़म की तर्जुमानी है

फ़िगार उन्नावी

अजीब कश्मकश है कैसे हर्फ़-ए-मुद्दआ कहूँ

फ़िगार उन्नावी

आदाब-ए-आशिक़ी से तो हम बे-ख़बर न थे

फ़िगार उन्नावी

ये सूरज क्यूँ भटकता फिर रहा है

फ़ज़्ल ताबिश

ये बस्ती कब दरिंदों से थी ख़ाली

फ़ज़्ल ताबिश

वही दो-चार चेहरे अजनबी से

फ़ज़्ल ताबिश

सूरज ऊँचा हो कर मेरे आँगन में भी आया है

फ़ज़्ल ताबिश