Couplets Poetry (page 403)

अब कौन जा के साहिब-ए-मिम्बर से ये कहे

फ़ाज़िल जमीली

उन की मानिंद कोई साहब-ए-इदराक कहाँ

फ़ज़ल हुसैन साबिर

तुम ने क्यूँ दिल में जगह दी है बुतों को 'साबिर'

फ़ज़ल हुसैन साबिर

तू जफ़ाओं से जो बदनाम किए जाता है

फ़ज़ल हुसैन साबिर

शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ 'साबिर'

फ़ज़ल हुसैन साबिर

'साबिर' तेरा कलाम सुनें क्यूँ न अहल-ए-फ़न

फ़ज़ल हुसैन साबिर

ज़िंदगी ख़ुद को न इस रूप में पहचान सकी

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

यूँ मआनी से बहुत ख़ास है रिश्ता अपना

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ये तमाशा दीदनी ठहरा मगर देखेगा कौन

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

वो मेल-जोल हुस्न ओ बसीरत में अब कहाँ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

वक़्त ने किस आग में इतना जलाया है मुझे

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

तुझे हवस हो जो मुझ को हदफ़ बनाने की

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

तलाश-ए-मअ'नी-ए-मक़्सूद इतनी सहल न थी

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

शख़्सियत का ये तवाज़ुन तेरा हिस्सा है 'फ़ज़ा'

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

पलकों पर अपनी कौन मुझे अब सजाएगा

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

नुत्क़ से लब तक है सदियों का सफ़र

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

मुझे तराश के रख लो कि आने वाला वक़्त

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

लोग मुझ को मिरे आहंग से पहचान गए

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

किसी लम्हे तो ख़ुद से ला-तअल्लुक़ भी रहो लोगो

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

किस तरह उम्र को जाते देखूँ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ख़ाक-ए-'शिबली' से ख़मीर अपना भी उट्ठा है 'फ़ज़ा'

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ख़बर मुझ को नहीं मैं जिस्म हूँ या कोई साया हूँ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

कहाँ वो लोग जो थे हर तरफ़ से नस्तालीक़

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

जला है शहर तो क्या कुछ न कुछ तो है महफ़ूज़

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

हम हसीन ग़ज़लों से पेट भर नहीं सकते

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

हर इक क़यास हक़ीक़त से दूर-तर निकला

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

ग़ज़ल के पर्दे में बे-पर्दा ख़्वाहिशें लिखना

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

एक दिन ग़र्क़ न कर दे तुझे ये सैल-ए-वजूद

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

देखना हैं खेलने वालों की चाबुक-दस्तियाँ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी