Couplets Poetry (page 404)
ऐ 'फ़ज़ा' इतनी कुशादा कब थी मअ'नी की जिहत
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अच्छा हुआ मैं वक़्त के मेहवर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अब मुनासिब नहीं हम-अस्र ग़ज़ल को यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
आँखों के ख़्वाब दिल की जवानी भी ले गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
तुझे ख़बर है कि इब्तिदा भी है इंतिहा भी
फ़य्याज़ तहसीन
कुछ उक़दे ऐसे होते हैं जो न ही खुलें तो बेहतर है
फ़य्याज़ तहसीन
जिसे पाने की ख़्वाहिश में जिए थे
फ़य्याज़ तहसीन
न तुम आए न चैन आया न मौत आई शब-ए-व'अदा
फ़य्याज़ हाशमी
चोरी ख़ुदा से जब नहीं बंदों से किस लिए
फ़य्याज़ हाशमी
ये सोचा है कि तुझ को सोचना अब छोड़ दूँगा मैं
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
तुझ से दिल में जो गिला था वो न लाए लब पर
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
राह में उस की चलें और इम्तिहाँ कोई न हो
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
कैसे मुमकिन है कि क़िस्से जिस से सब वाबस्ता हों
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
जुगनू हवा में ले के उजाले निकल पड़े
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
जब उन की बज़्म में हर ख़ास ओ आम रुस्वा है
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
बढ़ाना हाथ पकड़ने को रंग मुट्ठी में
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
तुझ को मंज़ूर नहीं मुझ को है अब भी मंज़ूर
फ़े सीन एजाज़
मिल रही है मुझे ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा
फ़े सीन एजाज़
मिरा रोता बच्चा बहलता था जिस से
फ़े सीन एजाज़
मैं कहाँ आया हूँ लाए हैं तिरी महफ़िल में
फ़े सीन एजाज़
कोई तो ज़िद में ये आ कर कभी कहे हम से
फ़े सीन एजाज़
किस अनमोल पशेमानी की दौलत है इन आँखों में
फ़े सीन एजाज़
कैसे आता है दबे पाँव गुनाहों का ख़याल
फ़े सीन एजाज़
जो मरा है हादसे में मिरा उस से क्या था रिश्ता
फ़े सीन एजाज़
इश्क़ किया तो अपनी ही नादानी थी
फ़े सीन एजाज़
हज़ारों साल की थी आग मुझ में
फ़े सीन एजाज़
अच्छी-ख़ासी रुस्वाई का सबब होती है
फ़े सीन एजाज़
अब के रूठे तो मनाने नहीं आया कोई
फ़े सीन एजाज़
वो जिस का नाम पड़ा है ख़मोश लोगों में
फ़व्वाद अहमद
तुम मुझे छोड़ के इस तरह नहीं जा सकते
फ़व्वाद अहमद