Couplets Poetry (page 402)

सुनते हैं कि इन राहों में मजनूँ और फ़रहाद लुटे

फ़ज़्ल ताबिश

रात को ख़्वाब बहुत देखे हैं

फ़ज़्ल ताबिश

न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती

फ़ज़्ल ताबिश

माँगने से हुआ है वो ख़ुद-सर

फ़ज़्ल ताबिश

कमरे में आ के बैठ गई धूप मेज़ पर

फ़ज़्ल ताबिश

हर इक शय ख़ून में डूबी हुई है

फ़ज़्ल ताबिश

नक़ाब उन ने रुख़ से उठाई तो लेकिन

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

हमारे उन के तअल्लुक़ का अब ये आलम है

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

है सख़्त मुश्किल में जान साक़ी पिलाए आख़िर किधर से पहले

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

ग़म-ए-दौराँ में कहाँ बात ग़म-ए-जानाँ की

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

फ़रेब-ए-करम इक तो उन का है इस पर

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

अहल-ए-हुनर के दिल में धड़कते हैं सब के दिल

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

आँखों का तो काम ही है रोना

फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली

ज़ियादा देर उसे देखना भी है 'फ़ाज़िल'

फ़ाज़िल जमीली

ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं

फ़ाज़िल जमीली

तुम कभी एक नज़र मेरी तरफ़ भी देखो

फ़ाज़िल जमीली

सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है

फ़ाज़िल जमीली

सब अपने अपने दियों के असीर पाए गए

फ़ाज़िल जमीली

पुराने यार भी आपस में अब नहीं मिलते

फ़ाज़िल जमीली

मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया

फ़ाज़िल जमीली

मिसाल-ए-शम्अ जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ

फ़ाज़िल जमीली

मिरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया

फ़ाज़िल जमीली

मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ

फ़ाज़िल जमीली

मैं ही अपनी क़ैद में था और मैं ही एक दिन

फ़ाज़िल जमीली

मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता

फ़ाज़िल जमीली

मैं अपने आप से आगे निकलने वाला था

फ़ाज़िल जमीली

मैं अक्सर खो सा जाता हूँ गली-कूचों के जंगल में

फ़ाज़िल जमीली

इस कॉकटेल का तो नशा ही कुछ और है

फ़ाज़िल जमीली

हमारे कमरे में उस की यादें नहीं हैं 'फ़ाज़िल'

फ़ाज़िल जमीली

इक तअल्लुक़ था जिसे आग लगा दी उस ने

फ़ाज़िल जमीली