Couplets Poetry (page 406)
सितारों की तरह अल्फ़ाज़ की ज़ौ बढ़ती जाती है
फ़सीह अकमल
मुद्दआ इज़हार से खुलता नहीं है
फ़सीह अकमल
किताबों से न दानिश की फ़रावानी से आया है
फ़सीह अकमल
जिन्हें तारीख़ भी लिखते डरेगी
फ़सीह अकमल
हर एक आँख में आँसू हर एक लब पे फ़ुग़ाँ
फ़सीह अकमल
हमीं पे ख़त्म हैं जौर-ओ-सितम ज़माने के
फ़सीह अकमल
हमारी फ़त्ह के अंदाज़ दुनिया से निराले हैं
फ़सीह अकमल
बहुत सी बातें ज़बाँ से कही नहीं जातीं
फ़सीह अकमल
अब किसी और का तुम ज़िक्र न करना मुझ से
फ़सीह अकमल
सुब्ह होती है तो दफ़्तर में बदल जाता है
फ़रियाद आज़र
मैं उस की बातों में ग़म अपना भूल जाता मगर
फ़रियाद आज़र
मैं जिस में रह न सका जी-हुज़ूरियों के सबब
फ़रियाद आज़र
मैं अपनी रूह लिए दर-ब-दर भटकता रहा
फ़रियाद आज़र
जो दूर रह के उड़ाता रहा मज़ाक़ मिरा
फ़रियाद आज़र
इस तमाशे का सबब वर्ना कहाँ बाक़ी है
फ़रियाद आज़र
हम इब्तिदा ही में पहुँचे थे इंतिहा को कभी
फ़रियाद आज़र
बंद हो जाता है कूज़े में कभी दरिया भी
फ़रियाद आज़र
ऐसी ख़ुशियाँ तो किताबों में मिलेंगी शायद
फ़रियाद आज़र
अदा हुआ न क़र्ज़ और वजूद ख़त्म हो गया
फ़रियाद आज़र
तू समझता है कि मैं कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर
फ़रताश सय्यद
तिरे ख़िलाफ़ किया जब भी एहतिजाज ऐ दोस्त
फ़रताश सय्यद
रंग-ओ-ख़ुशबू का कहीं कोई करे ज़िक्र तो बात
फ़रताश सय्यद
आसमानों पे उड़ो ज़ेहन में रक्खो कि जो चीज़
फ़रताश सय्यद
तुम तो ख़ुद सहरा की सूरत बिखरे बिखरे लगते हो
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
मिरे जज़्बे मिरी शहादत हैं
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
हर शख़्स को फ़रेब-ए-नज़र ने किया शिकार
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
अभी तलक है सदा पानियों पे ठहरी हुई
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
ये और बात कि वो तिश्ना-ए-जवाब रहा
फ़र्रुख़ जाफ़री
थे उस के हाथ लहू में हमारे ग़र्क़ मगर
फ़र्रुख़ जाफ़री