Couplets Poetry (page 407)
मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें
फ़र्रुख़ जाफ़री
कोई ठहरता नहीं यूँ तो वक़्त के आगे
फ़र्रुख़ जाफ़री
जिस्म के अंदर जो सूरज तप रहा है
फ़र्रुख़ जाफ़री
हिजाब उस के मिरे बीच अगर नहीं कोई
फ़र्रुख़ जाफ़री
हर रोज़ दिखाई दें सब लोग वहीं लेकिन
फ़र्रुख़ जाफ़री
वक़्त इक मौज है आता है गुज़र जाता है
फ़ारूक़ शमीम
झूट सच में कोई पहचान करे भी कैसे
फ़ारूक़ शमीम
हिसार-ए-ज़ात से कट कर तो जी नहीं सकते
फ़ारूक़ शमीम
हैं राख राख मगर आज तक नहीं बिखरे
फ़ारूक़ शमीम
धूप छूती है बदन को जब 'शमीम'
फ़ारूक़ शमीम
अपने ही फ़न की आग में जलते रहे 'शमीम'
फ़ारूक़ शमीम
ज़ेहन की आवारगी को भी पनाहें चाहिए
फ़ारूक़ शफ़क़
सुना है हर घड़ी तू मुस्कुराता रहता है
फ़ारूक़ शफ़क़
शहर में जीना है चलना दो-रुख़ी तलवार पर
फ़ारूक़ शफ़क़
शहर का मंज़र हमारे घर के पस-ए-मंज़र में है
फ़ारूक़ शफ़क़
सामने झील है झील में आसमाँ
फ़ारूक़ शफ़क़
इस सियह-ख़ाने में तुझ को जागना है रात भर
फ़ारूक़ शफ़क़
होने वाला था इक हादसा रह गया
फ़ारूक़ शफ़क़
अपनी लग़्ज़िश को तो इल्ज़ाम न देगा कोई
फ़ारूक़ शफ़क़
आँधियों का ख़्वाब अधूरा रह गया
फ़ारूक़ शफ़क़
आज सोचा है जागूँगा मैं रात में
फ़ारूक़ शफ़क़
तू ख़ुदा है तो बजा मुझ को डराता क्यूँ है
फ़ारूक़ नाज़की
सुना है लोग वहाँ मुझ से ख़ार खाते हैं
फ़ारूक़ नाज़की
सितारे बोती रहीं नींद से तही आँखें
फ़ारूक़ नाज़की
संग-परस्तों की बस्ती में शीशा-गरों की ख़ैर नहीं है
फ़ारूक़ नाज़की
क़द्रों की हदें तोड़ नई तरह निकाल
फ़ारूक़ नाज़की
मुझ से क्या पूछते हो नाम पता
फ़ारूक़ नाज़की
मैं हूँ 'मुज़्तर' बदन की नगरी में
फ़ारूक़ नाज़की
काँच के अल्फ़ाज़ काग़ज़ पर न रख
फ़ारूक़ नाज़की
जुनूँ-आसार मौसम का पता कोई नहीं देगा
फ़ारूक़ नाज़की