Couplets Poetry (page 409)

ऐन मुमकिन है उसे मुझ से मोहब्बत ही न हो

फरीहा नक़वी

ज़िंदगी में ऐसी कुछ तुग़्यानीयाँ आती रहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा

फ़ारिग़ बुख़ारी

याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए

फ़ारिग़ बुख़ारी

तुम्हारे साथ ही उस को भी डूब जाना है

फ़ारिग़ बुख़ारी

सफ़र में कोई किसी के लिए ठहरता नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

पुकारा जब मुझे तन्हाई ने तो याद आया

फ़ारिग़ बुख़ारी

नई मंज़िल का जुनूँ तोहमत-ए-गुमराही है

फ़ारिग़ बुख़ारी

मोहब्बतों की शिकस्तों का इक ख़राबा हूँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

मंसूर से कम नहीं है वो भी

फ़ारिग़ बुख़ारी

क्या ज़माना है ये क्या लोग हैं क्या दुनिया है

फ़ारिग़ बुख़ारी

कितने शिकवे गिले हैं पहले ही

फ़ारिग़ बुख़ारी

जितने थे तेरे महके हुए आँचलों के रंग

फ़ारिग़ बुख़ारी

जलते मौसम में कोई फ़ारिग़ नज़र आता नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

हम से इंसाँ की ख़जालत नहीं देखी जाती

फ़ारिग़ बुख़ारी

हम एक फ़िक्र के पैकर हैं इक ख़याल के फूल

फ़ारिग़ बुख़ारी

हज़ार तर्क-ए-वफ़ा का ख़याल हो लेकिन

फ़ारिग़ बुख़ारी

दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

दीवारें खड़ी हुई हैं लेकिन

फ़ारिग़ बुख़ारी

जिस बादल ने सुख बरसाया जिस छाँव में प्रीत मिली

फ़रहत ज़ाहिद

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ

फ़रहत ज़ाहिद

अल्फ़ाज़ न आवाज़ न हमराज़ न दम-साज़

फ़रहत ज़ाहिद

ज़िंदगी कट गई मनाते हुए

फ़रहत शहज़ाद

ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है

फ़रहत शहज़ाद

तुझ को खो कर मुझ पर वो भी दिन आए

फ़रहत शहज़ाद

तिरा वजूद गवाही है मेरे होने की

फ़रहत शहज़ाद

सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है

फ़रहत शहज़ाद

परस्तिश की है मेरी धड़कनों ने

फ़रहत शहज़ाद

मुझ पे हो जाए तिरी चश्म-ए-करम गर पल भर

फ़रहत शहज़ाद

मैं शायद तेरे दुख में मर गया हूँ

फ़रहत शहज़ाद