Couplets Poetry (page 411)

तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात

फ़रहत एहसास

तभी वहीं मुझे उस की हँसी सुनाई पड़ी

फ़रहत एहसास

शुस्ता ज़बाँ शगुफ़्ता बयाँ होंठ गुल-फ़िशाँ

फ़रहत एहसास

सर सलामत लिए लौट आए गली से उस की

फ़रहत एहसास

सख़्त तकलीफ़ उठाई है तुझे जानने में

फ़रहत एहसास

सब के जैसी न बना ज़ुल्फ़ कि हम सादा-निगाह

फ़रहत एहसास

क़िस्सा-ए-आदम में एक और ही वहदत पैदा कर ली है

फ़रहत एहसास

फिर तुझे छू के देखता हूँ मैं

फ़रहत एहसास

फिर सोच के ये सब्र किया अहल-ए-हवस ने

फ़रहत एहसास

मोहब्बत फूल बनने पर लगी थी

फ़रहत एहसास

मिट्टी की ये दीवार कहीं टूट न जाए

फ़रहत एहसास

मिरी मोहब्बत में सारी दुनिया को इक खिलौना बना दिया है

फ़रहत एहसास

मेरी इक उम्र और इक अहद की तारीख़ रक़म है जिस पर

फ़रहत एहसास

मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है

फ़रहत एहसास

मेरे हर मिस्रे पे उस ने वस्ल का मिस्रा लगाया

फ़रहत एहसास

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं

फ़रहत एहसास

मैं जब कभी उस से पूछता हूँ कि यार मरहम कहाँ है मेरा

फ़रहत एहसास

मैं बिछड़ों को मिलाने जा रहा हूँ

फ़रहत एहसास

मैं भी यहाँ हूँ इस की शहादत में किस को लाऊँ

फ़रहत एहसास

लोग यूँ जाते नज़र आते हैं मक़्तल की तरफ़

फ़रहत एहसास

क्या बदन है कि ठहरता ही नहीं आँखों में

फ़रहत एहसास

किसी हालत में भी तन्हा नहीं होने देती

फ़रहत एहसास

किस की है ये तस्वीर जो बनती नहीं मुझ से

फ़रहत एहसास

कौन सी ऐसी ख़ुशी है जो मिली हो एक बार

फ़रहत एहसास

कभी इस रौशनी की क़ैद से बाहर भी निकलो तुम

फ़रहत एहसास

जो इश्क़ चाहता है वो होना नहीं है आज

फ़रहत एहसास

जिस्म का कूज़ा है अपना और न ये दरिया-ए-जाँ

फ़रहत एहसास

जिसे भी प्यास बुझानी हो मेरे पास रहे

फ़रहत एहसास

जब उस को देखते रहने से थकने लगता हूँ

फ़रहत एहसास

जान ये सरकशी-ए-जिस्म तिरे बस की नहीं

फ़रहत एहसास