Couplets Poetry (page 413)
मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ
फ़रहत अब्बास शाह
कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
फ़रहत अब्बास शाह
यूँ भी किया है हम ने हक़-ए-दिलबरी अदा
फ़रहान सालिम
उन्हें गुमाँ कि मुझे उन से रब्त है 'सालिम'
फ़रहान सालिम
तुझे ख़बर ही नहीं है ये क़िस्सा-ए-कोताह
फ़रहान सालिम
शौक़-ए-बेहद ने किसी गाम ठहरने न दिया
फ़रहान सालिम
मता-ए-दर्द मआल-ए-हयात है शायद
फ़रहान सालिम
हूँ वारदात का ऐनी गवाह मैं मुझ से
फ़रहान सालिम
हौसला सब ने बढ़ाया है मिरे मुंसिफ़ का
फ़रहान सालिम
हैं इन में बंद किसी अहद-ए-रस्त-ख़ेज़ के अक्स
फ़रहान सालिम
है मेरी आँखों में अक्स-ए-नविश्ता-ए-दीवार
फ़रहान सालिम
अक्स कुछ न बदलेगा आइनों को धोने से
फ़रहान सालिम
अब उस मक़ाम पे है मौसमों का सर्द मिज़ाज
फ़रहान सालिम
अब मुझ से सँभलती नहीं ये दर्द की सौग़ात
फ़रहान सालिम
आम है इज़्न कि जो चाहो हवा पर लिख दो
फ़रहान सालिम
तुम्हें भी भूलने की कोशिशें कीं
फ़रीद परबती
किसी पे करना नहीं ए'तिबार मेरी तरह
फ़रीद परबती
कभी मेरी तलब कच्चे घड़े पर पार उतरती है
फ़रीद परबती
'फ़रीद' इक दिन सहारे ज़िंदगी के टूट जाएँगे
फ़रीद परबती
बगूला बन के उड़ा ख़्वाहिशों के सहरा में
फ़रीद परबती
तरब का रंग मोहब्बत की लौ नहीं देता
फ़रीद जावेद
हमें भी अपनी तबाही पे रंज होता है
फ़रीद जावेद
गुफ़्तुगू किसी से हो तेरा ध्यान रहता है
फ़रीद जावेद
ये दिल है दिल इसे सीने में हरगिज़
फ़राज़ सुल्तानपूरी
फूलों की ताज़गी में उदासी है शाम की
फ़राज़ सुल्तानपूरी
कहीं ऐसा न हो मैं दूर ख़ुद अपने से हो जाऊँ
फ़राज़ सुल्तानपूरी
'फ़राज़' इस तरह ज़िंदगी है गुज़ारी
फ़राज़ सुल्तानपूरी
धूप की सख़्ती तो थी लेकिन 'फ़राज़'
फ़राज़ सुल्तानपूरी
ज़रा सी बात पे क्या क्या न खो दिया मैं ने
फ़राग़ रोहवी
यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं
फ़राग़ रोहवी