Couplets Poetry (page 399)

माइल-ए-बेदाद वो कब था 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

लाई न ऐसों-वैसों को ख़ातिर में आज तक

फ़िराक़ गोरखपुरी

लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है

फ़िराक़ गोरखपुरी

क्या जानिए मौत पहले क्या थी

फ़िराक़ गोरखपुरी

कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा

फ़िराक़ गोरखपुरी

कुछ न पूछो 'फ़िराक़' अहद-ए-शबाब

फ़िराक़ गोरखपुरी

कोई समझे तो एक बात कहूँ

फ़िराक़ गोरखपुरी

कोई आया न आएगा लेकिन

फ़िराक़ गोरखपुरी

किसी की बज़्म-ए-तरब में हयात बटती थी

फ़िराक़ गोरखपुरी

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी

फ़िराक़ गोरखपुरी

किस लिए कम नहीं है दर्द-ए-फ़िराक़

फ़िराक़ गोरखपुरी

ख़ुद मुझ को भी ता-देर ख़बर हो नहीं पाई

फ़िराक़ गोरखपुरी

खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही

फ़िराक़ गोरखपुरी

ख़राब हो के भी सोचा किए तिरे महजूर

फ़िराक़ गोरखपुरी

कौन ये ले रहा है अंगड़ाई

फ़िराक़ गोरखपुरी

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में

फ़िराक़ गोरखपुरी

कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं

फ़िराक़ गोरखपुरी

कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है

फ़िराक़ गोरखपुरी

कह दिया तू ने जो मा'सूम तो हम हैं मा'सूम

फ़िराक़ गोरखपुरी

जो उलझी थी कभी आदम के हाथों

फ़िराक़ गोरखपुरी

जिस में हो याद भी तिरी शामिल

फ़िराक़ गोरखपुरी

जहाँ में थी बस इक अफ़्वाह तेरे जल्वों की

फ़िराक़ गोरखपुरी

इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए

फ़िराक़ गोरखपुरी

इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो

फ़िराक़ गोरखपुरी

इश्क़ अभी से तन्हा तन्हा

फ़िराक़ गोरखपुरी

इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा

फ़िराक़ गोरखपुरी

इस दौर में ज़िंदगी बशर की

फ़िराक़ गोरखपुरी

इनायत की करम की लुत्फ़ की आख़िर कोई हद है

फ़िराक़ गोरखपुरी

हम से क्या हो सका मोहब्बत में

फ़िराक़ गोरखपुरी

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है

फ़िराक़ गोरखपुरी