Couplets Poetry (page 397)
इक ख़ौफ़ सा दरख़्तों पे तारी था रात-भर
फ़ुज़ैल जाफ़री
एहसास-ए-जुर्म जान का दुश्मन है 'जाफ़री'
फ़ुज़ैल जाफ़री
दिल यूँ तो गाह गाह सुलगता है आज भी
फ़ुज़ैल जाफ़री
दश्त-ए-तन्हाई में जीने का सलीक़ा सीखिए
फ़ुज़ैल जाफ़री
चमकते चाँद से चेहरों के मंज़र से निकल आए
फ़ुज़ैल जाफ़री
बोसे बीवी के हँसी बच्चों की आँखें माँ की
फ़ुज़ैल जाफ़री
भूले-बिसरे हुए ग़म फिर उभर आते हैं कई
फ़ुज़ैल जाफ़री
अख़्लाक़ ओ शराफ़त का अंधेरा है वो घर में
फ़ुज़ैल जाफ़री
आतिश-फ़िशाँ ज़बाँ ही नहीं थी बदन भी था
फ़ुज़ैल जाफ़री
आठों पहर लहू में नहाया करे कोई
फ़ुज़ैल जाफ़री
जी तन में नहीं न जान बाक़ी
फ्रांस गॉड्लिब क्वीन फ़्रेस्को
तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके
फ़िज़ा कौसरी
वही जो देता है दुनिया को उलझनों से नजात
फ़िरदौस गयावी
तुम को आना है तो आ जाओ इसी आलम में
फ़िरदौस गयावी
तमाम उम्र जो हँसता ही रह गया यारो
फ़िरदौस गयावी
मैं एक संग हूँ मुझ में हैं सूरतें पिन्हाँ
फ़िरदौस गयावी
इल्म की इब्तिदा है हंगामा
फ़िरदौस गयावी
तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा
फ़िराक़ जलालपुरी
अभी कुछ और हम को तोहमतों के ज़हर पीने हैं
फ़िराक़ जलालपुरी
ज़ुल्मत ओ नूर में कुछ भी न मोहब्बत को मिला
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़िंदगी में जो इक कमी सी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा उसी का है जहाँ में तुझ को
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये ज़िंदगी के कड़े कोस याद आते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये ज़िल्लत-ए-इश्क़ तेरे हाथों
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
फ़िराक़ गोरखपुरी
वो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
वक़्त-ए-पीरी दोस्तों की बे-रुख़ी का क्या गिला
फ़िराक़ गोरखपुरी