Couplets Poetry (page 395)

आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता

ग़ालिब

आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं

ग़ालिब

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से

ग़ालिब

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

ग़ालिब

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए

ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

ग़ालिब

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी

ग़ालिब

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए

ग़ालिब

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'

ग़ालिब

आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'

ग़ालिब

ज़र्रे की तरह ख़ाक में पामाल हो गए

जोर्ज पेश शोर

उस माह-रू पे आँख किसी की न पड़ सकी

जोर्ज पेश शोर

तुम्हारे इश्क़ में क्या क्या न इख़्तियार किया

जोर्ज पेश शोर

शौक़ ने की जो रहबरी दिल की

जोर्ज पेश शोर

रुके है आमद-ओ-शुद में नफ़स नहीं चलता

जोर्ज पेश शोर

पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा

जोर्ज पेश शोर

नहीं है टूटे की बूटी जहान में पैदा

जोर्ज पेश शोर

जहाँ में ज़र का है कारख़ाना न कोई अपना न है यगाना

जोर्ज पेश शोर

जब जवानी गई छुड़ा कर हाथ

जोर्ज पेश शोर

जान पर अपनी हाए क्यूँ बनती

जोर्ज पेश शोर

इसी ख़याल में दिन-रात मैं तड़पता हूँ

जोर्ज पेश शोर

हवा के घोड़े पे रहता है वो सवार मुदाम

जोर्ज पेश शोर

है तलाश-ए-दो-जहाँ लेकिन ख़बर अपनी किसे

जोर्ज पेश शोर

गुज़िश्ता साल जो देखा वो अब की साल नहीं

जोर्ज पेश शोर

इक नज़र ने किया है काम तमाम

जोर्ज पेश शोर

इक ख़याल-ओ-ख़्वाब है ए 'शोर' ये बज़्म-ए-जहाँ

जोर्ज पेश शोर

दूर हम से हैं वो तो क्या डर है

जोर्ज पेश शोर

दिल में अपने आरज़ू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं

जोर्ज पेश शोर

देते न दिल जो तुम को तो क्यूँ बनती जान पर

जोर्ज पेश शोर

अदम से हस्ती में जब हम आए न कोई हमदर्द साथ लाए

जोर्ज पेश शोर