Couplets Poetry (page 394)
बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक
ग़ालिब
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
ग़ालिब
बे-इश्क़ उम्र कट नहीं सकती है और याँ
ग़ालिब
बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए
ग़ालिब
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
ग़ालिब
बस-कि हूँ 'ग़ालिब' असीरी में भी आतिश ज़ेर-ए-पा
ग़ालिब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
ग़ालिब
बार-हा देखी हैं उन की रंजिशें
ग़ालिब
बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम
ग़ालिब
बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
ग़ालिब
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
ग़ालिब
बैठा है जो कि साया-ए-दीवार-ए-यार में
ग़ालिब
बहुत दिनों में तग़ाफ़ुल ने तेरे पैदा की
ग़ालिब
बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात
ग़ालिब
बात पर वाँ ज़बान कटती है
ग़ालिब
और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
ग़ालिब
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
ग़ालिब
अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
ग़ालिब
अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
ग़ालिब
अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें
ग़ालिब
अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग
ग़ालिब
अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो
ग़ालिब
अगर ग़फ़लत से बाज़ आया जफ़ा की
ग़ालिब
अदा-ए-ख़ास से 'ग़ालिब' हुआ है नुक्ता-सरा
ग़ालिब
अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
ग़ालिब
आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
ग़ालिब
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
ग़ालिब
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
ग़ालिब
आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
ग़ालिब