Couplets Poetry (page 392)
गिरनी थी हम पे बर्क़-ए-तजल्ली न तूर पर
ग़ालिब
घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
ग़ालिब
ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
ग़ालिब
ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है
ग़ालिब
ग़लती-हा-ए-मज़ामीं मत पूछ
ग़ालिब
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
ग़ालिब
ग़ैर को या रब वो क्यूँकर मन-ए-गुस्ताख़ी करे
ग़ालिब
'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
ग़ालिब
'ग़ालिब' तिरा अहवाल सुना देंगे हम उन को
ग़ालिब
'ग़ालिब' न कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़
ग़ालिब
'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
ग़ालिब
'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
ग़ालिब
'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ग़ालिब
'ग़ालिब' अपना ये अक़ीदा है ब-क़ौल-ए-'नासिख़'
ग़ालिब
गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
गर किया नासेह ने हम को क़ैद अच्छा यूँ सही
ग़ालिब
गंजीना-ए-मअ'नी का तिलिस्म उस को समझिए
ग़ालिब
फ़र्दा-ओ-दी का तफ़रक़ा यक बार मिट गया
ग़ालिब
फ़ाएदा क्या सोच आख़िर तू भी दाना है 'असद'
ग़ालिब
ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना
ग़ालिब
इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
ग़ालिब
एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ग़ालिब
दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
ग़ालिब
दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर
ग़ालिब
दिल से मिटना तिरी अंगुश्त-ए-हिनाई का ख़याल
ग़ालिब
दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं
ग़ालिब