Couplets Poetry (page 391)

हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो 'असद'

ग़ालिब

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़

ग़ालिब

हर-चंद हो मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगू

ग़ालिब

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से

ग़ालिब

हर इक मकान को है मकीं से शरफ़ 'असद'

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

ग़ालिब

हर बुल-हवस ने हुस्न-परस्ती शिआ'र की

ग़ालिब

हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही

ग़ालिब

हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर जवाँ था अभी आरिफ़

ग़ालिब

हाँ अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़्त

ग़ालिब

हमारे शेर हैं अब सिर्फ़ दिल-लगी के 'असद'

ग़ालिब

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं

ग़ालिब

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

ग़ालिब

हैं आज क्यूँ ज़लील कि कल तक न थी पसंद

ग़ालिब

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'

ग़ालिब

है तमाशा-गाह-ए-सोज़-ए-ताज़ा हर यक उज़्व-ए-तन

ग़ालिब

है पर-ए-सरहद-ए-इदराक से अपना मसजूद

ग़ालिब

है मुश्तमिल नुमूद-ए-सुवर पर वजूद-ए-बहर

ग़ालिब

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ

ग़ालिब

है ख़याल-ए-हुस्न में हुस्न-ए-अमल का सा ख़याल

ग़ालिब

है ख़बर गर्म उन के आने की

ग़ालिब

है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब

ग़ालिब

है काएनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से

ग़ालिब

है गै़ब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद

ग़ालिब

है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'

ग़ालिब

है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल

ग़ालिब

हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते

ग़ालिब

गुंजाइश-ए-अदावत-ए-अग़्यार यक तरफ़

ग़ालिब

गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार

ग़ालिब

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

ग़ालिब