Couplets Poetry (page 393)

दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके

ग़ालिब

दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया

ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

ग़ालिब

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को

ग़ालिब

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव

ग़ालिब

ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी

ग़ालिब

देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा

ग़ालिब

देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है

ग़ालिब

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़

ग़ालिब

देखिए लाती है उस शोख़ की नख़वत क्या रंग

ग़ालिब

दे मुझ को शिकायत की इजाज़त कि सितमगर

ग़ालिब

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह

ग़ालिब

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

ग़ालिब

दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग

ग़ालिब

दम लिया था न क़यामत ने हनूज़

ग़ालिब

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई

ग़ालिब

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना

ग़ालिब

छोड़ा न रश्क ने कि तिरे घर का नाम लूँ

ग़ालिब

चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेज़-रौ के साथ

ग़ालिब

चाहते हैं ख़ूब-रूयों को 'असद'

ग़ालिब

चाहिए अच्छों को जितना चाहिए

ग़ालिब

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल

ग़ालिब

बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल

ग़ालिब

बोसा कैसा यही ग़नीमत है

ग़ालिब

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

ग़ालिब

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी

ग़ालिब

भागे थे हम बहुत सो उसी की सज़ा है ये

ग़ालिब

बे-पर्दा सू-ए-वादी-ए-मजनूँ गुज़र न कर

ग़ालिब