Couplets Poetry (page 389)
कौन है जो नहीं है हाजत-मंद
ग़ालिब
करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला
ग़ालिब
करे है क़त्ल लगावट में तेरा रो देना
ग़ालिब
काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब
ग़ालिब
कम नहीं जल्वागरी में, तिरे कूचे से बहिश्त
ग़ालिब
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं
ग़ालिब
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
ग़ालिब
कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना
ग़ालिब
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग
ग़ालिब
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
ग़ालिब
कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है
ग़ालिब
काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ग़ालिब
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
ग़ालिब
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी
ग़ालिब
जो ये कहे कि रेख़्ता क्यूँके हो रश्क-ए-फ़ारसी
ग़ालिब
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ग़ालिब
जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
ग़ालिब
जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिए
ग़ालिब
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
ग़ालिब
जम्अ करते हो क्यूँ रक़ीबों को
ग़ालिब
जल्वे का तेरे वो आलम है कि गर कीजे ख़याल
ग़ालिब
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
ग़ालिब
जब तवक़्क़ो ही उठ गई 'ग़ालिब'
ग़ालिब
जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलम
ग़ालिब
जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद
ग़ालिब
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
ग़ालिब
जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
ग़ालिब
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ग़ालिब
जान तुम पर निसार करता हूँ
ग़ालिब