Couplets Poetry (page 387)
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
ग़ालिब
न सुनो गर बुरा कहे कोई
ग़ालिब
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा
ग़ालिब
न लुटता दिन को तो कब रात को यूँ बे-ख़बर सोता
ग़ालिब
न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही
ग़ालिब
न बंधे तिश्नगी-ए-ज़ौक़ के मज़मूँ 'ग़ालिब'
ग़ालिब
मुनहसिर मरने पे हो जिस की उमीद
ग़ालिब
मुझ तक कब उन की बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
ग़ालिब
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
ग़ालिब
मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है
ग़ालिब
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
ग़ालिब
मिसाल ये मिरी कोशिश की है कि मुर्ग़-ए-असीर
ग़ालिब
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
ग़ालिब
मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
ग़ालिब
मौत का एक दिन मुअय्यन है
ग़ालिब
मरते मरते देखने की आरज़ू रह जाएगी
ग़ालिब
मरते हैं आरज़ू में मरने की
ग़ालिब
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
ग़ालिब
मैं ने मजनूँ पे लड़कपन में 'असद'
ग़ालिब
मैं ने कहा कि बज़्म-ए-नाज़ चाहिए ग़ैर से तिही
ग़ालिब
मैं ने जुनूँ से की जो 'असद' इल्तिमास-ए-रंग
ग़ालिब
मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ
ग़ालिब
मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ
ग़ालिब
मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
ग़ालिब
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
ग़ालिब
मैं भला कब था सुख़न-गोई पे माइल 'ग़ालिब'
ग़ालिब
मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
ग़ालिब
मैं और बज़्म-ए-मय से यूँ तिश्ना-काम आऊँ
ग़ालिब
मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब
ग़ालिब